संसू, मैरवा (सिवान) : जहां कोरोना से पूरा देश लॉकडाउन हो गया है, वहीं कुछ लोग अपनी जान हथेली पर लेकर समाज की सेवा में जुटे हुए हैं। चाहे वह चिकित्सक हो या दूध आपूर्तिकर्ता। इन्हीं जांबाजों में से एक संदीप भी हैं जो अपनी जान की परवाह किए बगैर डोर टू डोर दूध आपूर्ति कर रहे हैं। कोरोना का भय तो इन्हें भी हैं, लेकिन यह डर तब कम हो जाता है जब इन्हें समाज के उन बच्चे बूढ़े और मरीजों का ख्याल आता है जिन्हें दूध की नितांत आवश्यकता है। रोज सुबह इन जरुरतमंदों के बारे में यह सोच कर संदीप घर से निकल पड़ते हैं कि अगर दूध ऐसे लोगों के पास नहीं पहुंचा तो क्या होगा? लोगों को तो घर पर बैठे- बैठे दूध उपलब्ध हो जाता है, लेकिन उन्हें संदीप और ऐसे उन तमाम लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए जो अपनी जान को हथेली पर लेकर कोरोना जैसे जानलेवा वायरस संक्रमण की चुनौती स्वीकार कर अपने कर्तव्य पर लगे हुए हैं। संदीप गुठनी प्रखंड के पड़री निवासी हैं। उनका परिवार दूध का कारोबार करते हैं। दूध खरीद कर होटल और लोगों को डोर टू डोर आपूर्ति करते हैं। इस काम में उनके पिता और तीन भाई लगे हैं। लॉकडाउन के पहले करीब साढ़े तीन क्विटल दूध सुबह शाम प्रतिदिन की आपूर्ति थी लेकिन लॉक डॉउन के बाद, होटल बंद हो जाने से दूध की आपूर्ति घटकर महज 25 से 30 लीटर तक सिमट गई है। संदीप का कहना है कि होटलों में दूध आपूर्ति बंद हो चुकी है, लेकिन कुछ घरों को दूध आपूर्ति डोर टू डोर अभी कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें दूध की बहुत ही आवश्यकता है। दूध बंद हो जाएगा तो बच्चे व बूढ़े कैसे रहेंगे। बीमार लोगों को दवा के साथ दूध लेनी है तो उन्हें तो दूध पहुंचाना ही पड़ेगा। संदीप का कहना है कि इस काम में घर के चार लोग लगे थे, लेकिन इस समय केवल वहीं दूध की आपूर्ति कर रहे हैं। इस आपूर्ति के लिए उन्हें गुठनी प्रखंड से मैरवा प्रखंड आना पड़ता है। करीब 5 किमी. के दायरे में अभी दूध की आपूर्ति कर रहे हैं। उनका कहना है कि दूध का व्यवसाय जरूर है, लेकिन वर्तमान स्थिति में वे इसे समाज सेवा समझकर कर रहे हैं।

Posted By: Jagran

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