सीतामढ़ी। बिहार में फ्लाई ऐश ईंट निर्माण को बढ़ावा देने की कोशिशों में

लाल ईंट बनाने वाली चिमनियों से धुंआ निकलना कब बंद हो जाए कहा नहीं जा सकता, मगर ये बात अबूझ पहेली ही बनकर रह गई कि हर चीज की जब वाजिब कीमत होती है, राज्य या केंद्र सरकार से रेट तय होती है तो ये ईंटों के मामले में दोहरा रवैया क्यों? राज्य सरकार ने ईंट की कीमत का कोई रेट ही निर्धारित नहीं कर रखी है, और दलील यह कि उसको अपने राजस्व वसूली से मतलब है। जिला खनन पदाधिकारी रंजना भारती का कहना है कि सरकार या विभाग की ओर से ईंट का मूल्य तय नहीं है। न इसको लेकर कोई दिशा-निर्देश ही सरकार से प्राप्त है। खनन विभाग ईंट भट्ठा मालिकों से एकमुश्त तय राशि सालाना वसूल करती है। अधिक से अधिक राजस्व वसूली कर लक्ष्य को हासिल करना मकसद होता है। अब ये बात सामने आ रही है कि खनन विभाग ईंट की सरकारी स्तर पर कीमत निर्धारण का फैसला किया है। पिछले दिनों इस संबंध में राज्य स्तर पर बैठक भी हुई। सभी जिलों में ईंट की कीमत निर्धारण के लिए फिर से बैठक करने का निर्णय लिया गया।

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ईंट वालों की मनमानी देखिए पक्का बिल शायद ही किसी को मिल पाता

ईंट उद्योग संचालक खुलेआम मनमानी कर रहे हैं। तीन बुनियादी सुविधाओं- रोटी, कपड़ा के बाद मकान का ही नाम आता है लेकिन, सिर पर छत सबको नसीब कहां हो पाता है। वह भी तब जब छह रुपये की एक ईंट दस रुपये में बिकती हो। आम आदमी ठगी का शिकार है। जिले में 213 छोटे-बड़े ईंट उद्योग संचालित हैं। इनमें कई ईंट उद्योग अवैध रूप से संचालित हो रहे हैं। एक व्यवसायी ने गुमनामी की शर्त पर बताया कि मिट्टी, बालू, कोयला, मजदूरी सहित अन्य खर्चे व मुनाफे को ध्यान में रखते हुए ईंट की कीमत छह हजार रुपये प्रति हजार ईंट से अधिक नहीं होनी चाहिए। एक ईंट में चार रुपये 50 पैसे की मिट्टी व बालू की लागत आती है। अन्य खर्चे भी जोड़ दिए जाए तो छह रुपये प्रति ईंट बिक्री करने पर भी फायदा ही है। जबकि, छह रुपये की ये एक ईंट दस रुपये में बिक रही है। क्या मजाल चार रुपये अधिक कीमत देकर भी किसी को ईंट का पक्का बिल मिल जाता हो। बिल विपत्र मिल भी गया हो तो निश्चय ही वह फर्जी होगा। --------------------------------------------------

ईंट बनानेवालों की दलील- ईंटों का आकार-प्रकार अलग होने से तय नहीं रेट जानकारों के मुताबिक, ईंट की अलग-अलग साइज होती है। इस कारण कीमतों का निर्धारण नहीं हो पाता है। ईंट के आकार में एकरूपता के लिए भी कभी पहल नहीं हुई। इससे ईंट बनानेवाली कंपनियां अपने-अपने हिसाब से ईंट बनाती हैं और थोड़ी-बहुत साइज घटा-बढ़ाकर दाम उपर-नीचा कर देती हैं। यहीं वजह है कि प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई नहीं हो पाती। और इसकी आड़ में चिमनी मालिक अपनी मनमानी करते हैं।

Edited By: Jagran