सीतामढ़ी। मुकेश कुमार 'अमन', रीगा प्रखंड के खरसन गांव की बिटिया गायत्री के प्रयासों की सराहना देश और दुनियाभर में हो रही है। यूएनएचसीआर (यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी) ने भी गायत्री की सराहना की है। 17 साल की गायत्री ने लॉकडाउन के दौरान अपनी पंचायत के 900 परिवारों को भूखे मरने से बचाया है। लॉकडाउन में घिरे हुए संक्रमण व मौत के सबसे करीब इस समुदाय के बेघर-बेसहारा लोग खड़े थे। खुद गायत्री के परिवार में खाने-पीने की दिक्कत थी। उपर से पंचायत के उन जरूरतमंद परिवारों को मदद पहुंचाना कोई आसान काम नहीं था। मगर कहते हैं न कि बुलंद हौसले के आगे हार भी जीत में बदल जाया करती है। गायत्री के साथ भी ऐसा ही वाक्या हुआ। गायत्री बताती है कि कोरोना संकट के बाद रोज कमाने-खाने वालों की स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मेरे परिवार समेत मेरे मुसहर समुदाय के सैकड़ों घरों में खाने-पीने की दिक्कत हो गई। मैं सोच रही थी कि अपनी बात किससे कहूं, किससे मदद मांगू? इसी बीच गांव की एक सरिता दीदी को मेरी परेशानियों व बेचैनियों के बारे में मालूम हुआ। उनकी कॉल मेरी मदद के लिए आई। उनसे हमने आपबीती सुनाई और फिर हमारी बात सीतामढ़ी डीएम अभिलाषा कुमारी शर्मा तक जा पहुंची। डीएम की पहल के बाद सभी जरूरतमंदों तक मदद पहुंच गई। इस प्रकार गायत्री चाइल्ड चैंपियन के रूप में देश और दुनिया के सामने आई। चाइल्ड चैंपियन गायत्री का आज हर कोई कर रहा गुणगान

चाइल्ड चैंपियन गायत्री ने अपने इलाके के लोगों को खाना पहुंचाने के लिए सीतामढ़ी की जिलाधिकारी से गुहार लगाई। गायत्री के जेहन में ये बात कैसे आई कि डीएम से मदद मांगनी चाहिए। आमतौर पर हर कोई डरता है, हिचकता है कि डीएम तक कैसे पहुंचा जाए, उनसे अपनी बात कैसे रखी जाए, फिर इसने कैसे इतनी साहस जुटा ली? किस तरीके से इसने अपनी बात डीएम तक पहुंचाई? जिसके बाद पंचायत के तमाम जरूरतमंदों तक खाने-पीने का इंतजाम पहुंच सका। इस सवाल पर गायत्री का कहना है कि'शादी बच्चों का खेल नहीं'नामक एक परियोजना से जुड़ी हुई हूं। यह परियोजना किशोरियों की बेहतरी के लिए 2016 से शुरू हुई थी। उसी परियोजना के माध्यम से समुदाय के लिए भोजन जुटाने को डीएम तक पहुंच पाई। गायत्री ने संस्था के साथ मिलकर भी दिखाई नई राह

रीगा, सीतामढ़ी के चार्म और सेव द चिल्ड्रन से जुड़कर गायत्री और उसके साथ तमाम अन्य किशोरियों ने लोगों को नई राह भी दिखाई है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए यह संस्था अनूठी पहल कर रही है। अपनी परियोजना'शादी बच्चों का खेल नहीं'के तहत रीगा प्रखंड के 9 गांवों में ललिता बाबू किशोरी महासंघ समूह से जुड़ी किशोरियों को वीडियो कॉल की मदद से मास्क बनाने का प्रशिक्षण दे रही है। अब ये किशोरी गांव के खेत और ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले लोगों के साथ ही दूसरे लोगों को मुफ्त में मास्क बांट रहीं हैं। किशोरियों ने 4000 फेस मास्क विभिन्न सहयोगी संस्थाओं के माध्यम से लोगों के बीच पहुंचा चुकी हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किशोरियों के समूहों ने खुद से मास्क बनाकर बांटना शुरू कर दिया है। कपड़े के मास्क के उपयोग पर सरकार द्वारा दी गई सलाह के बाद, चार्म संस्था ने अपनी परियोजना से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहीं किशोरियों और समुदायों के लिए फेस मास्क पहुंचाने की ठानी। किशोरी महासंघ की सचिव बेबी कुमारी ने बताया कि कोरोना संक्रमण का रोजगार-धंधों पर असर पड़ा है। इस स्थिति को देखते हुए हमने घर-घर मास्क बनवाने की रणनीति बनाई है।

कोट

जिला प्रशासन उन जैसी बिटिया के हौसले और जज्बे का कायल है। उसने लॉकडाउन में गांव-पंचायत के लोगों की मदद के लिए मुझसे संपर्क किया। वहां के लोगों की तकलीफों से अवगत कराया। उसके चलते ही उस इलाके के लोगों का दुख-दर्द सामने आया। तुरंत बाद हमने अपने अफसरों को उस इलाके में भेजा। जांच कराई और तुरंत राशन बांटने के आदेश भी दिए। लॉकडाउन में रोजी-रोटी छीनने से गांव के लोगों को तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। उस बिटिया के चलते वहां तक समय पर राशन पहुंच पाई।

अभिलाषा कुमारी शर्मा, जिलाधिकारी, सीतामढ़ी।

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