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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 17, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

खंडहर में तब्दील हो रहा आठ सौ साल पुराना मठ

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Published: Tue, 17 Jan 2017 11:58 PM (IST)Updated: Wed, 18 Jan 2017 12:29 AM (IST)

सीतामढ़ी। डुमरा प्रखंड के बेरबास पंचायत के राघोपुर बखरी गांव में स्थापित ऐतिहासिक रामजानकी मठ का विश

खंडहर में तब्दील हो रहा आठ सौ साल पुराना मठ
खंडहर में तब्दील हो रहा आठ सौ साल पुराना मठ

सीतामढ़ी। डुमरा प्रखंड के बेरबास पंचायत के राघोपुर बखरी गांव में स्थापित ऐतिहासिक रामजानकी मठ का विशाल भवन खंडहर में तब्दील हो रहा है। इसके जीर्णोद्धार के प्रति सामाजिक, राजनीतिक या प्रशासनिक स्तर पर कोई पहल नहीं की जा रही है। खंडहर हो रहे मठ के भवन की भव्यता, इस पर उकेरे गए शिल्प व स्थापत्य इसके ऐतिहासिक व कलात्मक महत्व को रेखांकित करते हैं।

स्थापना व भव्यता

मठ प्रांगण चारों ओर से विशाल दोमंजिले भवन से घिरा है। प्रांगण के भीतर ही आकर्षक रामजानकी मंदिर है, जिसके दरवाजे पर खुदे लेख में मठ के संवत 1193 में महंत रघुनाथ दास महाराज द्वारा स्थापित होना अंकित है। मुख्य द्वार से अंदर जाने के बाद रामजानकी मंदिर जाने के लिए एक और द्वार है। मंदिर व अन्य भवनों की भव्यता, पुरानी शैली के झरोखे, पत्थर के खंभे व बरामदे, इस पर उकेरे गए शिल्प तत्कालीन स्थापत्य कला क बेहतरीन नमूना हैं। पत्थर से बने स्तंभ में टंगा साढ़े बारह मन वजनी घंटा भी आकर्षक है। अब यह सारा कुछ खंडहर बनकर धाराशायी हो रहा है।

¨कवदंती

पूर्व में इलाका जंगल से घिरा था। यहां संत रघुनाथ महाराज कुटिया बनाकर तप करते थे। उनके ज्ञान व तप की चर्चा सुन दरभंगा महाराज दर्शन को आए। महाराजा को आता देख संत अपने चबूतरे के साथ ही उनके पास पहुंचे थे। ¨कवदंती के अनुसार संत ने तपस्थल पर ही जीवित समाधि ले ली थी।

होते थे विशाल आयोजन

तीन दशक पूर्व तक मठ रामनवमी, झूलन व दशहरा पर विभिन्न धार्मिक उत्सव किए जाते थे। विशाल जुलूस, आतिशबाजी, ढोल नगाड़े के साथ घुड़दौड़ देखने इलाके के लोग जमा होते थे। बाजार पर अखाड़ा होता था, जिसमें दूर-दूर के पहलवान शामिल होते थे। मठ में संत व राहगीरों को आश्रय मिलता था।

मठ को बचाने की नहीं हुई कोई पहल

वर्तमान महंत रामलीला दास ने बताया कि 12 पुश्तों से उनके वंश के लोग इस मठ के महंत बनते आ रहे हैं। वे 1983 से मठ का कार्य संभाल रहे हैं। उनसे पहले रामकृष्ण दास महाराज महंत थे। हदबंदी में मठ की संपत्ति चली गई। 45 एकड़ जमीन ही बची है। आय सिमट गई है। वर्ष 2013 में धार्मिक न्यास से आचार्य कुणाल ने मठ का निरीक्षण किया था। लेकिन मठ को बचाने की कोई पहल नहीं हुई।

मठ की स्थिति से लोग हैं आहत

ग्रामीण मोहित राम, गजेंद्र राम, रामजिनिश ¨सह, वेदनारायण गुप्ता, गोपाल ठाकुर, दामोदर प्रसाद, अविनाश प्रसाद, सामाजिक कार्यकर्ता पहारू बैठा व ज्ञान प्रकाश ने बताया कि इस ऐतिहासिक मठ की स्थिति से लोग आहत हैं। इस मठ से ही यहां के गरीब जीते थे।

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