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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 19, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सावन से कार्तिक तक जलाधिवास में रहते शुकेश्वर नाथ महादेव

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Published: Sat, 19 Jul 2014 06:16 PM (IST)

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19 एसएमटी 9 से 11 तक

- बसबिट्टा गांव में है शुकेश्वर नाथ महादेव

- शुकेश्वर मुनी ने त्रेता युग में की थी शिवलिंग की स्थापना

- चार माह शिवलिंग के गर्भगृह में रहता पानी, इससे बारिश की स्थिति का पता चलता

- सावन माह में यहां श्रद्धालुओं की रहती है भीड़

- यहां मांगी गई हर मन्नत होती है पूरी

मुनीन्द्र कुमार झा/ यशवंत कुमार, सीतामढ़ी/मेजरगंज

भारत-नेपाल सीमा पर मेजरगंज प्रखंड मुख्यालय से दस किमी की दूरी पर बसबिट्टा गांव में स्थित है शुकेश्वर नाथ महादेव का अति प्राचीन मंदिर। मंदिर न केवल भारत व नेपाल के लोगों के आस्था का केंद्र है बल्कि यहां के भोलेनाथ दोनों देशों के लोगों के मन-मंदिर में रच-बस गए हैं। कहते है कि यहां जो भी आया और भोलेनाथ के आगे शीश नवाया, उसकी मुराद पुरी हुई है। अब तक कोई भी शुकेश्वरनाथ महादेव के दर से खाली नहीं गया है। वैसे तो यहां सालो भर लोग आते-जाते रहते हैं, लेकिन सावन माह में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। महादेव के पानी में डूबे रहने के कारण भले ही लोगों को दर्शन नहीं होते हैं, लेकिन बाहर से ही जलाभिषेक कर खुद को पुण्य के भागी मानते हैं।

क्या है इतिहास :

शुकेश्वर मुनी द्वारा शिवलिंग की स्थापना किए जाने के कारण ही नाम शुकेश्वरनाथ महादेव पड़ा। जानकारों के अनुसार त्रेता युग में स्वयंबर में भाग लेने जनकपुर जाने के दौरान बसबिट्टा गांव में शुकेश्वर ऋषि ने शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शंकर की पूजा की थी। मिथिला नरेश राजा जनक ने भी बसविट्टा पहुंच कर बाबा शुकेश्वरनाथ महादेव की पूजा - अर्चना की थी। कहते हैं कि इस स्थान पर भोलेनाथ ने राजा जनक व शुकेश्वर ऋषि को दर्शन दिया था। श्रीराम जानकी विवाह के बाद जनकपुर से लौटते ऋषि-मुनि यहां मंदिर निर्माण कराकर भोले नाथ की पूजा-अर्चना के बाद वापस गए थे। बाद में यह मंदिर जमींदोज हो गया। भूकंप की त्रासदी झेलने के बाद जनकपुर राज दरबार द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। वर्तमान में मंदिर की देखभाल महंथ राजेश मिश्र कर रहे हैं। यहां स्थापित शिवलिंग अतिप्राचीन है। धरती की सामान्य उंचाई से दस फीट नीचे करीब सात फीट लंबा शिवलिंग है। सावन से कार्तिक तक शिवलिंग जलाधिवास में रहते हैं। चार महीनों में शिवलिंग का गर्भगृह पानी में डूबा रहता है। लिहाजा सावन से कार्तिक तक मंदिर के बाहर स्थित भगवान शिव की प्रतिमा पर ही लोग जलाभिषेक करते हैं। मंदिर के गर्भ गृह का पानी इलाके में मौसम की भविष्यवाणी करता है। गर्भगृह में जितना पानी होता है, इलाके में उतना ही अधिक पानी होता है। गर्भगृह में पानी सूखने से इलाके में अकाल की स्थिति होती है। मंदिर के पास तालाब व कुंआ है। इसके जल से बाबा का अभिषेक किया जाता है। वहीं मंदिर की ओर से धर्मशाला बनाया गया है। जहां दूर-दराज के श्रद्धालु ठहरते हैं। यहां नित्य भजन, कीर्तन व रामधुन होता रहता है। यहां बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि व सावन में मेला लगता है।

क्या है चढ़ावा : बेलपत्र, कनैल का फुल, नदी का जल व दूध बाबा को चढ़ता है।

क्या है मान्यताएं : मान्यता है कि जिस वर्ष बाबा जल शयन नहीं करते उस वर्ष क्षेत्र में भयंकर सूखे की स्थिति बनती है।

कैसे जाएं : सीतामढ़ी स्टेशन से 35 किमी की दूरी पर भारत-नेपाल सीमा से सटे बसबिट्टा गांव में बाबा शुकेश्वर नाथ महादेव का मंदिर। सीतामढ़ी से मेजरगंज बस से या फिर गाड़ी भाड़ा कर यहां जा सकते हैं। मेजरगंज से टेम्पो या निजी वाहन से बसबिट्टा जाया जा सकता है।

कहां ठहरें : बसबिट्टा स्थित शुकेश्वरनाथ महादेव मंदिर परिसर में मंदिर प्रबंधन द्वारा धर्मशाला का निर्माण कराया गया है। जहां पर्यटक व श्रद्धालु ठहरते है। इसके अलावा सीतामढ़ी शहर में कई होटल है, जहां ठहरा जा सकता है।

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