शेखपुरा : गांव में जब बाढ़ आता है तो पानी में किसानों की फसल ही नहीं डूबती किसानों के अरमान भी डूब जाते हैं ।  उन्हीं अरमान को फिर से सहेजने और समेटने की जद्दोजहद बाढ़ प्रभावित गांव शेखपुरा जिले के घाटकुसुम्भा प्रखंड के पुरैना में 60 वर्षीय धानो महतो, सरिता देवी, मनीष, जयराम महतो दिखे। धानो महतो गर्दन तक पानी में एक किलोमीटर दूर अपने मकई के खेत में जाते हैं और फिर पानी में गोता लगाकर मकई के फल को तोड़ते हैं। उसको बोरा में बांधा जाता है और जब दस-बारह बोरे में मकई बांध लिया जाता है फिर सभी बोरे को एक साथ, एक रस्सी में बांधकर गर्दन भर पानी में उस रस्सी को खींचते हुए गांव के पास सड़क के किनारे तक लाया जाता है। जहां उनकी दो बेटियां उनको मदद कर बोरे को सड़क पर लाती है और सपरिवार मकई के बाल को सड़क पर सुखाने में लग जाते हैं। मकई के बाल को सड़क के किनारे सुखाने, उसे पानी से निकालकर लाने में सपरिवार लगे हुए है। घाटकुसुंभा प्रखंड के एक दर्जन से अधिक गांवों में आजादी के इतने सालों के बाद भी संपर्क पथ नहीं बन सका है जिसकी वजह से बाढ़ आने पर गांव के लोग गांव में ही फंसे हुए रहते हैं । वहां से प्रखंड मुख्यालय अथवा जिला मुख्यालय आने के लिए उनको नाव का ही सहारा होता है । इसका दर्द अस्पताल में उस समय देखने को मिला जब मोबाइल पर अस्पताल के एक कर्मी को यह मैसेज आया कि टीकाकरण के बाद एक बच्चे की स्थिति बिगड़ गई है। अस्पताल के कर्मचारी उस बच्चे को अस्पताल तक लाने का निर्देश कॉल करने वालों को देते रहे परंतु वहां नाव की सुविधा नहीं होने से वे लोग अस्पताल नहीं आ सके, हालांकि बाद में उस बच्चे को स्थिति में सुधार की बात सामने आई। बाढ़ का नतीजा यह कि अस्पताल में एकमात्र चिकित्सक डॉ निरंजन कुमार है कहते हैं कि पिछले चार दिनों से रात दिन जागे हुए हैं। कभी कोई मरीज आता है तो कभी कोई । यहां एकमात्र वहीं चिकित्सक हैं जिससे उन्हें कहीं जाने में भी नहीं बन रहा।

Posted By: Jagran

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