शहर की नौकरी नहीं, गांव की मिट्टी चुनी... शेखपुरा में चंदन ने प्रशिक्षण लिया और मुर्गी पालन से संवारी जिंदगी
शेखपुरा के चंदन कुमार ने शहर जाने के बजाय 'आत्मा' योजना के तहत मुर्गी पालन का प्रशिक्षण लेकर अपना व्यवसाय ...और पढ़ें

HighLights
चंदन कुमार ने 'आत्मा' योजना से मुर्गी पालन का प्रशिक्षण लिया।
गांव में ही अपना व्यवसाय शुरू कर आत्मनिर्भरता हासिल की।
सीधी बिक्री से बेहतर दाम मिलते हैं, जिससे आय बढ़ी।
जागरण संवाददाता, शेखपुरा। रोजगार की तलाश में गांव से शहर की ओर पलायन करना बिहार के युवाओं के सामने लंबे समय से बड़ी चुनौती रहा है। लेकिन शेखपुरा के चंदन कुमार ने रोजगार के लिए बाहर जाने के बजाय गांव में ही काम शुरू करने का रास्ता चुना। उन्होंने ‘आत्मा’ योजना के तहत मुर्गी पालन का प्रशिक्षण लिया और इसी हुनर को अपना व्यवसाय बना लिया।
प्रशिक्षण के दौरान मिली तकनीकी जानकारी ने उन्हें मुर्गी पालन को व्यवस्थित तरीके से शुरू करने का भरोसा दिया। इसके बाद उन्होंने अपने स्तर पर कारोबार शुरू किया और धीरे-धीरे उसे आगे बढ़ाया।
आज मुर्गी पालन उनके लिए सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और आत्मनिर्भरता का माध्यम बन गया है। चंदन की कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण मिले तो गांव में रहकर भी व्यवसाय खड़ा किया जा सकता है।
शहर की नौकरी नहीं, गांव में ही रोजगार का फैसला
हर युवा चाहता है कि उसे अपने परिवार के साथ रहते हुए रोजगार का अवसर मिले और उसकी आमदनी भी बेहतर हो। लेकिन रोजगार के सीमित विकल्पों के कारण बड़ी संख्या में युवा दूसरे शहरों की ओर रुख करते हैं।
ऐसे में पशुपालन और मुर्गी पालन ग्रामीण इलाकों में स्थानीय रोजगार का विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं। इन व्यवसायों की खासियत है कि इन्हें गांव और घर के आसपास रहकर भी शुरू किया जा सकता है।
सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी के जरिए युवाओं को इन गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।चंदन कुमार ने इसी रास्ते को अपनाकर अपने गांव में ही कमाई का जरिया तैयार किया।
‘आत्मा’ योजना से मिला प्रशिक्षण, फिर शुरू हुआ कारोबार
चंदन ने मुर्गी पालन शुरू करने से पहले ‘आत्मा’ योजना के तहत प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण में उन्हें मुर्गी पालन से जुड़ी तकनीकी जानकारी और बेहतर प्रबंधन के तरीके बताए गए।
विशेषज्ञों के मार्गदर्शन ने उन्हें इस काम को व्यवसाय के तौर पर समझने में मदद की। इसके बाद उन्होंने प्रशिक्षण में सीखी बातों को अपने काम में लागू करना शुरू किया।
वैज्ञानिक तरीके और बेहतर प्रबंधन अपनाने से उन्होंने धीरे-धीरे अपना कारोबार आगे बढ़ाया। यानी शुरुआत सिर्फ मुर्गी पालने से नहीं, बल्कि प्रशिक्षण लेकर व्यवस्थित तरीके से व्यवसाय शुरू करने से हुई।
सिर्फ 25 दिन में तैयार हो जाती हैं मुर्गियां
चंदन कुमार के मुताबिक, मुर्गी के बच्चे लाने के बाद करीब 25 दिनों में उनका वजन लगभग 1.2 से 1.25 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।
इसके बाद मुर्गियों को बाजार में बिक्री के लिए भेजा जाता है। उनका कहना है कि सीधे बाजार में बिक्री करने पर अपेक्षाकृत बेहतर कीमत मिलती है।
वहीं डीलर के जरिए बिक्री करने पर कीमत कुछ कम हो जाती है। चंदन के अनुसार, सीधे बाजार में मुर्गियां करीब 130 रुपये प्रति किलो तक बिक जाती हैं। जबकि डीलर के माध्यम से बिक्री करने पर करीब 110 से 115 रुपये प्रति किलो तक कीमत मिलती है।
सीधे बाजार में बिक्री से ज्यादा आमदनी का अनुभव
चंदन बताते हैं कि बाजार तक खुद पहुंचकर बिक्री करने से उन्हें बेहतर कीमत मिलती है। इसके मुकाबले डीलर के माध्यम से बिक्री करने पर प्रति किलो मिलने वाली कीमत कम रहती है।
यानी मुर्गी पालन में उत्पादन के साथ-साथ बाजार की जानकारी भी कमाई को प्रभावित करती है। सही समय पर बिक्री और बेहतर बाजार संपर्क छोटे कारोबार को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
चंदन ने प्रशिक्षण के साथ अपने अनुभव से बिक्री के इस पहलू को भी समझा है। इसी वजह से उनका कारोबार अब उनके परिवार के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है।
पशुपालन से लेकर पोल्ट्री तक, सरकार की योजनाओं पर जोर
बिहार में ग्रामीण स्तर पर पशुपालन और मुर्गी पालन को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें बिहार समग्र गव्य विकास योजना, एकीकृत पोल्ट्री विकास योजना और राष्ट्रीय पशुधन मिशन जैसी योजनाएं शामिल हैं।
इन योजनाओं के जरिए पात्र लाभार्थियों को विभिन्न प्रकार की सहायता और सब्सिडी का प्रावधान किया जाता है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देना और आय के अवसर पैदा करना है।
हालांकि किसी भी योजना का लाभ उसके निर्धारित नियमों और पात्रता के आधार पर ही मिलता है। युवाओं के लिए प्रशिक्षण के साथ इन योजनाओं और बाजार की जानकारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
‘आत्मा’ योजना क्या है और कैसे करती है मदद?
‘आत्मा’ यानी Agricultural Technology Management Agency कृषि तकनीक और प्रशिक्षण को किसानों तक पहुंचाने वाली व्यवस्था है।
जिला और प्रखंड स्तर पर इसके माध्यम से कृषि से जुड़ी तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इसके दायरे में कृषि के साथ बागवानी, पशुपालन और कौशल विकास से जुड़ी गतिविधियां भी शामिल हो सकती हैं।
चंदन कुमार ने इसी व्यवस्था के तहत मुर्गी पालन का प्रशिक्षण हासिल किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने सीखी हुई तकनीकों को अपने व्यवसाय में इस्तेमाल किया। उनकी कहानी ग्रामीण युवाओं के लिए प्रशिक्षण और स्थानीय उद्यमिता के बीच के संबंध को सामने रखती है।
गांव में रोजगार की तलाश करने वाले युवाओं के लिए संदेश
चंदन की कहानी का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्होंने रोजगार के लिए पलायन को ही एकमात्र विकल्प नहीं माना। उन्होंने उपलब्ध संसाधनों और प्रशिक्षण के आधार पर गांव में ही अपना काम शुरू किया।
मुर्गी पालन जैसे व्यवसाय में मेहनत के साथ तकनीकी जानकारी, प्रबंधन और बाजार की समझ भी जरूरी है। सरकारी प्रशिक्षण और योजनाओं की जानकारी युवाओं को ऐसे व्यवसाय शुरू करने में मदद कर सकती है।
स्थानीय स्तर पर छोटे कारोबार खड़े होने से परिवार की आय के साथ गांव की आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ सकती हैं। शेखपुरा के चंदन कुमार की कहानी इसी संभावना की एक मिसाल है।
