बिहार के शिवहर में आज भी जिंदा है सदियों पुरानी परंपरा, यहां झिझिया करती हैं युवतियां
शिवहर में नवरात्र के दौरान झिझिया लोकनृत्य की परंपरा आज भी जीवंत है, जिसमें युवतियां और महिलाएं सिर पर घड़ा ...और पढ़ें

बिहार के शिवहर में झिझिया करतीं युवतियां।
HighLights
शिवहर में झिझिया लोकनृत्य आज भी जीवंत है।
नवरात्र में युवतियां सिर पर घड़ा रखकर नृत्य करती हैं।
यह नृत्य सांस्कृतिक विरासत और कुरीतियों के खात्मे का प्रतीक है।
जागरण संवाददाता, शिवहर। आधुनिकता के दौर में कई परंपराएं लुप्त हो रही हैं, लेकिन शिवहर में झिझिया आज भी जीवंत है। नवरात्र के दस दिनों तक गांवों में युवतियां और महिलाएं इस लोकनृत्य के जरिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाती हैं।
गांव की गलियों, देवी स्थानों, नदी तटों और पूजा समितियों के पंडालों में झिझिया के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं। झिझिया को लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है। इसमें मिट्टी के घड़े में छेद कर जलता दीप रखा जाता है।
युवतियां इस घड़े को सिर पर रखकर लोकगीत गाती और नृत्य करती हैं। गीतों में समाज की खुशहाली और डायन जैसी कुरीतियों के खात्मे की कामना की जाती है। महिलाएं, युवतियां और किशोरियां स्वजनों की लंबी उम्र के लिए भी गीत गाती हैं। झिझिया के दौरान भूत-प्रेत और डायन के बुरे प्रभाव से बचाव की कामना की जाती है।
वयोवृद्ध पूर्व जिला पार्षद अजब लाल चौधरी के अनुसार, झिझिया लोकनृत्य, परंपरा, आस्था और कला-संस्कृति का संगम है। पहले महिलाएं बागमती नदी के तट पर झिझिया खेलती थीं, लेकिन धीरे-धीरे वहां यह परंपरा समाप्त हो गई। अब नवरात्र के दौरान गांवों में इसका आयोजन होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी झिझिया की प्रस्तुति देखने को मिलती है।
अजय कुमार बताते हैं कि झिझिया नृत्य राजा चित्रसेन और उनकी रानी के प्रेम प्रसंग पर आधारित है। डायन की कुदृष्टि से बचने के लिए भी यह नृत्य किया जाता है।
इस दौरान युवतियां ब्रह्म बाबा का आह्वान करते हुए गाती हैं, “तोहरे भरोसे हो ब्रह्म बाबा, झिझियां हम बनईली हो...” ग्रामीण मान्यता है कि गीतों के जरिए महिलाएं, युवतियां और किशोरियां अपने इष्टदेव को आमंत्रित करती हैं, ताकि वे तंत्र-मंत्र के बुरे प्रभाव से जनमानस की रक्षा करें। तालियों और कदम से कदम मिलाकर किए जाने वाले इस नृत्य का दृश्य आकर्षक होता है।
