संसू जलालपुर : मेडागास्कर तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है। लेकिन सिचाई के पुख्ता इंतजाम जरूरी हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर फसल की सिचाई की जा सके। सामान्यत: जमीन पर दरारें उभरने पर ही दोबारा सिचाई करनी होती है। इस तकनीक से धान की खेती में जहां भूमि, श्रम, पूंजी और पानी कम लगता है, वहीं उत्पादन 300 प्रतिशत तक ज्यादा मिलता है। इस पद्धति में प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर उत्पादकता बढाई जा सकती है । उक्त बातें शनिवार को मंझवलिया में डेमो विधि से रोपनी कराने के क्रम में कृषि सलाहकार अभिषेक आनंद ने कही। मौके पर मौजूद कृषि विज्ञान केंद्र मांझी के कोआर्डिनेटर राजेश कुमार सिंह ने बताया कि राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा ने धान की एक नई किस्म राजेंद्र मंसूरी का रिसर्च किया है जो किसानों के लिए वरदान साबित होता। प्रति हेक्टेयर 55 से 60 क्विटल की पैदावार है और यह 150 दिन में तैयार हो जाती है। इसी बीज को डेमो विधि से लगाया गया है। इस मौके पर कई किसानों ने इस विधि का अवलोकन कर खुद इस विधि से खेती करने का संकल्प किया।

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