सारण [बसंत कुमार सिंह]। मांझी थाना क्षेत्र के छपरा गांव निवासी बिहार रेजीमेंट पैरा स्पेशल फोर्स के कमांडो शैलेश कुमार सिंह की शहादत को याद कर आज भी गांव के लोग खुद को गौरवांवित महसूस करते हैं। उन्हें फख्र होता है कि वह उस शहीद के गांव के निवासी हैं, जिन्हें राष्ट्रपति ने शौर्य चक्र से सम्मानित किया है। गांव में शहीद के नाम पर एक प्राथमिक विद्यालय भी खोला गया है। आज भले ही शहीद का परिवार पटना शिफ्ट कर हो, लेकिन आसपास के लोग उसी सम्मान के साथ शहीद शैलेश कुमार सिंह को याद करते हैं। आइए सुनते हैं शैलेश की शहादत की कहानी पत्नी सोनी की जुबानी :-

आतंकियों के दुस्साहस का दिया मुंहतोड़ जवाब

बात 2 अप्रैल 2010 की है। मेरे पति कमांडो शैलेश कुमार सिंह और उनके साथियों ने जम्मू-कश्मीर के रजौली जिले के घने जंगल में खोजो और मार डालो ऑपरेशन के तहत आतंकियों के ठिकाने से 50 मीटर की दूरी पर निशाना ले रखा था। मल्टी ग्रेनेड लांचर से वे एक-एक कर आतंकवादियों को मार गिरा रहे थे।

मुठभेड़ के काफी देर चलने पर दो आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर  सुरक्षा बल के घेरे को तोडऩे का प्रयास किया। सुरक्षा घेरे को तितर-बितर होते देख शैलेश ने साथियों को जवाबी कार्रवाई का आदेश दिया और अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना टुकड़ी को पीछे छोड़ तेजी से आतंकियों की ओर बढ़ गए। उन्होंने दोनों आतंकियों को मार गिराया, लेकिन एक गोली उन्हें लगी  और वह शहीद हो गए।

मेरे पति के पराक्रम को देखते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया। मेरा सौभाग्य है कि अपने पति के पराक्रम का सम्मान प्राप्त करने का मुझे मौका मिला। बिहार सरकार की ओर से भी तत्कालीन राज्यपाल ने भी प्रशस्ति पत्र एवं मेडल देकर सम्मानित किया।

दादा, पिता भी थे सेना में, दक्षिण अफ्रीका में ली थी ट्रेनिंग

शैलेश ने साउथ अफ्रीका के इथोपिया में कमांडो ट्रेनिंग ली थी। मेरे पति के दादा स्व. परशुराम सिंह और पिता रामेश्वर भी फौज में थे। दादा चीन व पाकिस्तान की लड़ाई में शामिल हुए थे।

शैलेश बोलते थे- जिंदगी भले छोटी हो पर यादगार हो

  शैलेश को भारत माता से जितना प्रेम था उतना ही अपने परिवार और गांव से लगाव था। ऑपरेशन खोजो और मार डालो के लिए जाते समय उन्होंने मुझसे फोन पर बात कर कहा था कि पूरे परिवार को मिला कर सबके साथ प्यार से रहना। मैं जरूरी ऑपरेशन में जा रहा हूं, मेरा मोबाइल बंद रहेगा। लौट कर फिर बात करूंगा। वह हमेशा कहते थे कि बहुत लंबी जिंदगी से अच्छी है जिंदगी यादगार रहे, चाहे छोटी ही क्यों न हो। मैं अभी अपने पति की जगह दानापुर कैंट में पति की जगह नौकरी करती हूं। यहां मैं सास-ससुर व देवर साथ रहती हूं। विशेष आयोजन होने पर परिवार के सभी लोग गांव जाते हैं।

बां बोलीं: शहादत के एक दिन पहले की थी बात

शहादत से एक दिन पहले शैलेश ने मुझसे बात की थी। सभी का हालचाल पूछने के बाद कहा था कि मां सोनी का ध्यान रखना। वह जाने से पहले भी मुझे समझाता रहा। 23 दिन बाद ही उनकी शहादत का समाचार मिला।

  - राजकुमारी (शहीद की मां)

विभागीय कागजातों में शहीद के नाम पर नहीं है स्कूल

26 जनवरी 2012 को राज्यपाल ने  शहीद की पत्नी को सम्मानित किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 3 फरवरी 2012 को तत्कालीन विधायक सह मंत्री गौतम सिंह के साथ शहीद के घर गए और गांव शहीद की मूर्ति लगाने,  शहीद के नाम पर स्कूल और रेलवे स्टेशन का नामकरण शहीद के नाम पर करने लिए रेल मंत्रालय को पत्र लिखने का आश्वासन दिया था। गांव में  विद्यालय तो बन गया। स्कूल भवन पर शहीद का नाम भी दर्ज है, लेकिन स्थापना और विभाग की लापरवाही से कागज पर शहीद का नाम न होकर केवल नवसृजित प्राथमिक विद्यालय धनी छपरा ही है। शहीद के नाम पर बने इस स्कूल के पास घरों का गंदा पानी गिरता है। स्कूल में न तो चारदीवारी है और न ही पानी की समुचित व्यवस्था। स्कूल का फर्श भी टूट गया है।

कहते हैं गांव वाले

- शैलेश लाखों में एक थे। सबका सहयोग करने वाले और गांव-समाज के बारे में सोचने वाले। गांव ही नहीं फौज को भी उनकी शहादत पर नाज है।

- त्रिभुवन सिंह (पूर्व सैनिक व ग्रामीण)

-  शैलेश जब छुट्टी पर गांव आता था तो लड़कों को खेल का सामान  उपलब्ध कराता था। सभी के साथ खेलता था और युवाओं को फौज में जाने के लिए प्रोत्साहित करता था।

- प्रमोद सिंह (पूर्व उपमुखिया)

- शहादत के एक माह पहले होली में शैलेश आए थे। सुबह में नौजवानों को दौड़ाना, जिम ले जाकर कसरत कराना और हंसते हुए गांव में घूमकर सभी से मिलना उनका शौक था।

रामराज सिंह (ग्रामीण)

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