समस्तीपुर। हर चुनाव में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जात-पात जैसे तमाम मुद्दे उठते है। वादे होते हैं, वादे होते हैं, कुछ पूरे तो कुछ अधूरे रह जाते है, लेकिन किसी भी दल ने अभिभावकों के उस दर्द को साझा करने की कोशिश नहीं की जो उन्हें प्राइवेट स्कूलों से मिलता है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई को चौपट मानते हुए अभिभावक निजी स्कूलों का रुख करते हैं। इन्हें स्कूल की जगह दुकान कहें तो ज्यादा बेहतर होगा। एडमिशन फॉर्म से शुरू होने वाली वसूली ड्रेस, किताब, स्कूली वाहन और परीक्षा शुल्क के रूप में सालों भर जारी रहती है। हर साल 15 से 20 फीसद बढ़ोतरी और तीन से चार महीने की एडवांस फीस जमा करवाना तो आम बात है। इसके बाद भी ज्यादा कमीशन देने वाले प्रकाशक की पुस्तकें और मर्जी की ड्रेस। बच्चों के भविष्य को देखकर हर अभिभावक इस मनमानी को सहते हुए सिस्टम को कोसता है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने कभी इस दर्द पर मरहम लगाने का प्रयास नहीं किया। प्रस्तुत है समस्तीपुर से संवाददाता प्रकाश कुमार की रपट।

-- प्राइवेट स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश को ताक पर रखते हैं। यहां तो कई स्कूल कई महीनों की फीस एडवांस लेने के साथ ही एडमिशन फीस के नाम पर डोनेशन भी लेते हैं। समस्तीपुर शहर के अलावा रोसड़ा, हसनपुर, दलसिंहसराय, शाहपुरपटोरी, सरायरंजन, पूसा, ताजपुर सहित अलग-अलग स्थानों में यही स्थिति बनी हुई है। अपने मनचाहे प्रकाशक की किताबें कमीशन के चक्कर में चलाई जाती हैं तो ड्रेस भी मनमानी जगह से दिलाई जा रही है। प्रत्येक वर्ष एडमिशन फीस कराने के साथ-साथ मासिक फीस में वृद्धि कर दी जाती है। इस ओर ना तो किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा आवाज उठाया जा रहा है और ना ही प्रशासन ही सक्रिय है। जिले में शिक्षा विभाग से बिना रजिस्ट्रेशन लिए ही अधिकतर विद्यालय संचालित हो रहे है। जिले में जितने स्कूल है उतने ही प्रकाशकों की किताबें अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई जा रही है। सरकार ने भले ही एनसीईआरटी की किताबें लागू करने का निर्देश दिया हो, लेकिन आज भी निजी स्कूल प्रबंधन द्वारा चुनिदा प्रकाशकों की किताबें ही पढ़ाई जा रही है। फीस, ड्रेस और किताबों के नाम पर लूट जारी है। निजी विद्यालयों में अभिभावक फीस, तो बच्चे बस्ते के बोझ से दब रहते हैं। सरकारी स्कूलों की दुर्दशा से फल-फूल रहा धंधा

अधिसंख्य लोगों का मानना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी और प्रशासनिक उदासीनता के चलते यह धंधा फल फूल रहा है। अब शिक्षा केंद्रों की जगह किसी दुकान का स्वरूप लेते जा रहा है। कोई भी व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना नहीं चाहता। डोनेशन के नाम पर तो कभी बैग, जूतों, कपड़ों के मनमाने दाम लगाकर स्कूल प्रशासन अभिभावकों से ज्यादा फीस वसूल रहे हैं। अधिकतर स्कूल किताबों के लिए दुकान तय करते हैं। इतना ही नहीं स्कूल इवेंट्स के नाम पर भी बार-बार वसूली की जाती है। जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों की अनदेखी से अभिभावकों की जेबों पर डाका डाला जा रहा है। निजी स्कूलों में आरटीई के तहत नहीं होता नामांकन

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत जिले के निजी विद्यालयों में कमजोर एवं अभिवंचित वर्ग के बच्चों के नामांकन लेनी है। इसके तहत 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रहती है। बावजूद इसके विद्यालयों में इस नियम के तहत बच्चों का नामांकन नहीं लिया जाता है। नया शिक्षा सत्र शुरू हो चुका है। इस बार संयोग है कि इन दिनों लोकसभा चुनाव का माहौल भी है। अभिभावक स्कूल में प्रवेश से लेकर परीक्षा परिणाम मिलने तक शोषण का शिकार होते हैं। लेकिन कभी नहीं दिखा कि जनप्रतिनिधियों ने अपने ही मतदाताओं की इस शोषण की कहानी पर दो शब्द भी कहे हो। हर अभिभावक की सोच बच्चों को अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने की है। इसी मंशा से जहां इंग्लिश मीडियम स्कूलों की संख्या बढ़ी हैं। वहीं स्कूलों की मनमानी और अभिभावकों के शोषण का दायरा भी बढ़ा है। फीस का निर्धारण भी हर साल बिना किसी नियम के संचालक खुद तय करते हैं। बात नेताओं और जनप्रतिनिधियों तक भी पहुंचती है, लेकिन वह कुछ भी नहीं बोलते। न अपने क्षेत्र में और न ही सदन में किसी ने यह पीड़ा उठाई। चूंकि इन दिनों चुनावी माहौल है, ऐसे में स्कूलों के शोषण का यह मुद्दा गायब है। फीस बढ़ने और महंगी ड्रेस से बिगड़ रहा घर का बजट

बच्चों की बढ़ती फीस और महंगी ड्रेस ने कई महीनों को घर का बजट बिगाड़ दिया है। इस मुद्दे को जब बच्चों की माताओं के सामने उठाया तो उनकी पीड़ा बाहर आ गई। इस मुद्दे पर गृहिणी ऋृतु कुमारी कहती है कि चुनाव में इस को ही मुद्दा बनाना चाहिए। बढ़ती फीस ने घर का बजट बिगाड़ दिया है। स्कूल की बड़ी फीस से आम आदमी परेशान है स्कूल संचालक छुट्टियों की फीस लेते हैं। किताबें इतनी महंगी हैं कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देने में घर का बजट बिगड़ जाता है। ज्योति कुमारी कहती है कि बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे तो सभी उठा रहे हैं लेकिन प्राइवेट स्कूल संचालकों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। नूतन सिंह कहती है कि स्कूल संचालक एनसीईआरटी की किताबों से पढ़ाने की बजाए दूसरे प्रकाशन की किताब पढाई जा रही है। सरकार इन पर शिकंजा कसने के लिए ठोस कानून बनाएं।

Posted By: Jagran