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लाल पर रुकते नहीं, हरे का इंतजार नहीं; सहरसा में सिर्फ जलने-बुझने के काम आ रहे ट्रैफिक सिग्नल; बिना प्लानिंग की बत्तियां

Published: Wed, 02 Sep 2026 07:24 AM (GMT+05:30)

Saharsa Traffic Light System: सहरसा में लाखों रुपये खर्च कर लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल सफेद हाथी साबित हो रहे हैं, ...और पढ़ें

Saharsa Traffic Light System: सहरसा में ₹लाखों खर्च कर 8 चौराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्नल बने शोभा की वस्तु, 1 साल बाद भी डंडे के सहारे ट्रैफिक

Saharsa Traffic Light System: सहरसा में ₹लाखों खर्च कर 8 चौराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्नल बने शोभा की वस्तु, 1 साल बाद भी डंडे के सहारे ट्रैफिक

HighLights

  1. सहरसा के ट्रैफिक सिग्नल लाखों खर्च के बाद भी अप्रभावी।

  2. रेलवे क्रॉसिंग और अतिक्रमण से सिग्नल व्यवस्था बाधित।

  3. ट्रैफिक पुलिस आज भी डंडे के सहारे यातायात नियंत्रित करती।

जागरण संवाददाता, सहरसा। Saharsa Traffic Light System: सहरसा शहरी क्षेत्र को जाम के झाम से मुक्ति दिलाने और वाहनों के सुगम आवागमन के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल पूरी तरह सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। शहर के चौराहों पर लगी लाल, पीली और हरी बत्तियां सिर्फ जलने और बुझने तक सीमित रह गई हैं।

नियमों के अनुसार न तो लाल बत्ती पर वाहन रुकते हैं और न ही हरी बत्ती होने का इंतजार करते हैं। विडंबना यह है कि एक साल पूर्व शुरू की गई इस आधुनिक यातायात प्रणाली का अनुपालन कराने में ट्रैफिक डीएसपी, यातायात थाना प्रभारी और जिले के तमाम वरीय प्रशासनिक अधिकारी पूरी तरह विफल साबित हो चुके हैं। लाखों का सरकारी फंड खर्च होने के बावजूद सिग्नल महज एक शो-पीस बनकर रह गए हैं।

शहर में विकराल होती जाम की समस्या को देखते हुए सितंबर 2025 में शहर के थाना चौक, गंगजला चौक, सुभाष चौक, प्रशांत सिनेमा मोड़, कचहरी ढाला, यादव चौक, तिवारी चौक और महावीर चौक पर ट्रैफिक सिग्नल लाइटें लगाकर चालू की गई थीं। उद्देश्य था कि चौराहों पर वाहनों की आवाजाही ऑटोमैटिक तरीके से नियंत्रित हो सके। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी चौराहों पर तैनात यातायात पुलिसकर्मी सिग्नल के बजाय अपने डंडे के इशारे से ही वाहनों को निकालते दिखते हैं।

दो दिन के ट्रायल में ही धड़ाम हो गई थी व्यवस्था

ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली को सख्ती से लागू करने के लिए पूर्व में यातायात विभाग ने दो दिनों का ट्रायल किया था, लेकिन यह प्रयोग पूरी तरह फेल साबित हुआ। सिग्नल के अनुसार वाहनों को रोकने पर जाम कम होने के बजाय कई गुना बढ़ गया। दरअसल, शहर में सिग्नल लगाने से पूर्व जमीनी हकीकत और भौगोलिक परिस्थितियों का कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया। थाना चौक, कचहरी ढाला और प्रशांत सिनेमा मोड़ जैसे व्यस्ततम चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल ठीक रेलवे क्रॉसिंग (गुमटी) के मुहाने पर लगा दिए गए हैं। जैसे ही ट्रेन गुजरने के लिए रेलवे गुमटी बंद होती है, सिग्नल का पूरा टाइमिंग चक्र ध्वस्त हो जाता है और चारों तरफ वाहनों का भारी रेला लग जाता है।

  • सहरसा शहर के 8 प्रमुख चौराहों पर सितंबर 2025 में चालू किए गए ट्रैफिक सिग्नल एक साल बाद भी साबित हो रहे शो-पीस

  • रेलवे गुमटी के पास सिग्नल लगाने से बिगड़ी व्यवस्था; ट्रायल के दौरान ही फेल हो गया सिस्टम, गुमटी गिरते ही लग रहा महाजाम

  • चौराहों पर अतिक्रमण और संकरी सड़कें बनीं बड़ी बाधा; ट्रैफिक पुलिस आज भी डंडे के इशारे पर गाड़ियां निकलवाने को मजबूर

  • ट्रैफिक थाना प्रभारी बोले- रेलवे क्रॉसिंग बंद होने पर बढ़ जाती है परेशानी, एफओबी (FOB) बनने के बाद ही सुचारू संचालन संभव

संकरी सड़कें और अतिक्रमण भी बने रोड़ा

सिग्नल सिस्टम के फेल होने की दूसरी सबसे बड़ी वजह चौराहों पर पसरा भीषण अतिक्रमण है। जिन आठ चौराहों पर सिग्नल लगे हैं, वहां का अधिकांश हिस्सा फुटपाथी दुकानों, अवैध पार्किंग और ठेलों के कब्जे में है। संकरी सड़कों के कारण वाहन सिग्नल लेन में कतारबद्ध खड़े ही नहीं हो पाते। ट्रायल के समय भी अतिक्रमण को मुख्य बाधा माना गया था, लेकिन प्रशासन ने आज तक इन चौराहों से अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

अफसरों का तर्क- एफओबी बनने के बाद ही मिलेगी राहत

मामले को लेकर यातायात थाना प्रभारी रामाशंकर ने बताया कि ट्रैफिक सिग्नल का पालन कराने में व्यावहारिक कठिनाइयां आ रही हैं। खासकर रेलवे गुमटी वाले क्षेत्रों में जब क्रॉसिंग बंद होती है, तो वाहनों की लंबी कतार लग जाती है। उन्होंने कहा कि कुछ संवेदनशील स्थानों पर फुट ओवरब्रिज (FOB) बनने और अन्य आधारभूत संरचनाएं विकसित होने के बाद ही इसे पूरी तरह प्रभावी बनाया जा सकेगा।

वहीं, पूर्व जिला पार्षद सह कोसी विकास संघर्ष मोर्चा के संस्थापक प्रवीण आनंद ने इसे खुली प्रशासनिक विफलता करार दिया है। उन्होंने कहा कि बिना ठोस कार्ययोजना और विशेषज्ञों की राय लिए आनन-फानन में सिग्नल लगाना जनता के पैसों की बर्बादी है। लाखों खर्च के बाद भी बत्तियों के जलने-बुझने का कोई मतलब न होना व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान है।