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सहरसा: 300 वर्षों से आस्था का केंद्र है मैना गांव का मां भगवती मंदिर, विकास से अब भी दूर

Published: Mon, 17 Aug 2026 02:18 PM (IST)

सहरसा के मैना गांव स्थित मां भगवती मंदिर 300 वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जहां नागपंचमी पर ...और पढ़ें

300 वर्षों से आस्था का केंद्र है मैना गांव का मां भगवती मंदिर, विकास से अब भी दूर

300 वर्षों से आस्था का केंद्र है मैना गांव का मां भगवती मंदिर, विकास से अब भी दूर

HighLights

  1. मैना गांव का मां भगवती मंदिर 300 साल पुराना।

  2. नागपंचमी पर विशाल मेला, हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना को आते।

  3. मंदिर के विकास और संरक्षण की स्थानीय लोगों की मांग।

संवाद सूत्र, सोनवर्षाराज (सहरसा)। मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर पड़रिया पंचायत के मैना गांव स्थित मां भगवती का पौराणिक मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। करीब 300 वर्षों से यहां मां भगवती की पूजा-अर्चना किए जाने की बात कही जाती है।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखने वाला यह मंदिर आज भी अपेक्षित विकास और सुविधाओं से वंचित है। उचित रखरखाव और सुरक्षा के अभाव में इस प्राचीन धरोहर की पहचान धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, मैना गांव स्थित मां भगवती मंदिर में वर्ष 1961 से नागपंचमी के अवसर पर प्रतिवर्ष मेले का आयोजन होता आ रहा है। इस दौरान सहरसा सहित आसपास के कई जिलों से हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूरे दिन भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

बारिश के लिए सामूहिक पूजा की थी परंपरा

ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों पहले जब क्षेत्र में बारिश नहीं होती थी और किसान वर्षा के लिए तरसते थे, तब आसपास के गांवों के लोग सामूहिक रूप से कमल पुष्प लेकर मां भगवती की पूजा-अर्चना करने मंदिर पहुंचते थे। ग्रामीणों का विश्वास है कि मां की कृपा से इसके बाद अच्छी बारिश होती थी।

इससे किसानों के बीच मां भगवती के प्रति आस्था और मजबूत होती गई। एक ग्रामीण ने स्थानीय भाषा में प्रचलित कहावत सुनाते हुए कहा, 'ओध दिवारी बोरने थान, मैना के देवी घर-घर करलक पियान।' ग्रामीणों का कहना है कि यह कहावत भी मां भगवती के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।

कच्चे मकान से वर्तमान मंदिर तक पहुंची पूजा

ग्रामीणों के अनुसार, प्रारंभ में मां भगवती की पूजा वर्तमान मंदिर से पश्चिम स्थित गांव के एक छोटे से कच्चे मकान में होती थी। करीब 50 वर्षों तक इसी स्थान पर पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद करीब 1750 ईस्वी के आसपास वर्तमान मंदिर परिसर में एक कच्चे मकान में मां भगवती की प्रतिमा स्थापित की गई।

बाद में सोनवर्षाराज स्टेट के राजा हरिवल्लभ नारायण सिंह ने यहां पक्का मंदिर बनवाया। बताया जाता है कि राजा ने मां भगवती के नाम जमीन भी दान में दी थी।

करीब 200 वर्षों तक इसी पुराने मंदिर में पूजा-अर्चना होती रही। वर्ष 2002 में मां भगवती को नए और वर्तमान मंदिर में स्थापित किया गया। तब से इसी मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना जारी है।

पहले होती थी बलि, अब केवल परीक्षा की परंपरा

मां भगवती मंदिर में पहले बलि प्रदान करने की भी परंपरा थी। ग्रामीणों के अनुसार, प्रारंभ में कुश से बलि प्रदान की जाती थी, जिसके बाद तलवार से बलि देने की परंपरा शुरू हुई। करीब 1870-80 के दौरान बलि प्रदान करने की प्रथा को लेकर ग्रामीण दो गुटों में बंट गए थे।

एक गुट बलि देने के पक्ष में था, जबकि दूसरा इसके विरोध में था। इसको लेकर लंबे समय तक गांव में तनाव की स्थिति बनी रही। वर्ष 1981 के आसपास दोनों पक्षों के बीच बैठक हुई।

आपसी सहमति के बाद बलि प्रदान नहीं करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद बलि की प्रथा पूरी तरह समाप्त कर दी गई और गांव में व्याप्त तनाव भी खत्म हो गया। वर्तमान समय में यहां बलि नहीं दी जाती, बल्कि केवल परीक्षा की रस्म पूरी कर श्रद्धालु लौटते हैं।

विकास और संरक्षण की जरूरत

धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व रखने वाले इस मंदिर से कई जिलों के लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर परिसर के समुचित विकास, सौंदर्यीकरण, सुरक्षा और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जरूरत है।

स्थानीय लोगों ने प्रशासन से इस प्राचीन धार्मिक स्थल को पर्यटन एवं धार्मिक धरोहर के रूप में विकसित करने की मांग की है, ताकि इसकी ऐतिहासिक पहचान सुरक्षित रह सके।