संसू, सत्तरकटैया ( सहरसा ): पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण तो मिला। मगर यह व्यवस्था सत्तरकटैया प्रखंड में बेमानी साबित हो रही है। आलम यह है कि अधिकांश महिला के पति या रिश्तेदार का ही रौब चलता है। किसी भी काम के लिए लोगों को उन्हीं से मिलना होता है। खासतौर से पंचायतीराज में पदों पर आसीन अधिकतर महिला जनप्रतिनिधियों का काम उनके पति ही संभाल हैं। महिला मुखिया , पंचायत समिति सदस्य , वार्ड पंच , सरपंच पदों पर निर्वाचित महिलाओं ने अपने पतियों को कार्य सौंप देती है। जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति, निकट सम्बन्धी, रिश्तेदार या अन्य किसी व्यक्ति के माध्यम से कार्यालय में कार्य संपादित किए जा रहे हैं। बैठक में भी वे ही उपस्थित रहते है, जबकि महिला जनप्रतिनिधि घर पर रहती है। कभी कार्यप्रणाली के बारे में जनता सवाल पूछती है तो महिला जनप्रतिनिधि अपने पतियों की तरफ देखने लगती हैं। वास्तविकता के तह में जाए तो सभी श्रेणी की निर्वाचित महिला जन प्रतिनिधियों के अधिकारों को पति अपने हाथ में लेकर कार्यकर्ताओं का निपटारा करते हैं। ऐसा नहीं है कि महिला जन प्रतिनिधियों के अधिकारों के हनन की जानकारी विभागीय अधिकारियों को नहीं है, लेकिन वे भी महिला जनप्रतिनिधि के पति को मुखिया कहकर संबोधित करते हैं।

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189 पद है महिलाओं के लिए आरक्षित

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प्रखंड के कुल 14 पंचायतों के कुल 420 पदों में 189 पद आधी आबादी के लिए आरक्षित हैं। मुखिया के कुल 14 पदों में महिला 07 समिति सदस्य के कुल 18 पदों में महिला 08 सरपंच के कुल 14 पदों में महिला 07 पंच सदस्य के कुल 186 पदों में महिला 83 वार्ड सदस्य के कुल 186 पदों में महिला 83 जिला परिषद के कुल 02 पदों में महिला 01

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त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जितने वाली महिलाओं को अपने अधिकार व कर्तव्य के बारे में समझना होगा। तभी सरकार द्वारा 50 फीसदी महिलाओं को दिया गया आरक्षण का लाभ मिल पाएगा। समय समय पर सरकार द्वारा जन प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित भी किया जाता है। महिला जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच रुबरु होना एवं जनता के कार्यों में अपनी भागीदारी निभानी होगी।

अरविद कुमार , प्रखंड विकास पदाधिकारी , सत्तरकटैया।

Edited By: Jagran