विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बिहार के इस मंदिर में 857 साल पुराना रिश्वतखोरी का सबूत, राजा के मंत्री ने घूस लेकर जारी किया था फर्जी ताम्रपत्र

Published: Fri, 16 Oct 2026 08:06 PM (IST)

सासाराम के मां ताराचंडी धाम में देश का पहला रिश्वतखोरी का प्रमाणिक शिलालेख मौजूद है। यह 1169 ई. का शिलालेख ...और पढ़ें

ताराचंडी मंदिर के पास स्थित 1169 में लिखवाया गया शिलालेख। जागरण

ताराचंडी मंदिर के पास स्थित 1169 में लिखवाया गया शिलालेख। जागरण 

ब्रजेश पाठक, सासाराम (रोहतास)। 51 शक्ति स्थलों में से एक सासाराम स्थित मां ताराचंडी धाम में नवरात्रि में प्रतिदिन 75 हजार से एक लाख श्रद्धालु दर्शन पूजन के लिए पहुंच रहे हैं।

लगभग नौ सौ साल पहले भी यह स्थल न केवल आम लोगों के लिए बल्कि राजा-महाराजाओं के लिए आस्था के साथ आमजनों को सूचना देने के लिए भी प्रमुख स्थल के रूप में स्थापित था।

मंदिर के गर्भगृह के समीप एक ऐसा शिलालेख है जो संभवत: देश का पहला रिश्वतखोरी का प्रमाणिक अंकित दस्तावेज के रूप में अब भी मौजूद है।

रिश्‍वत लेने का पहला प्रमाण‍ित श‍िलालेख 

यहां 1169 में ख्यारवाल वंश के शासक महानायक प्रताप धवल देव द्वारा लिखवाया गया शिलालेख को रिश्वत लेने का पहला प्रमाणिक व लिखित शिलालेख माना जाता है।

जिसमें राजा के मंत्री को रिश्वत देकर दो गांव का जाली ताम्रपत्र बनवा लेने की बात लिखी गई है। इस शिलालेख ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार की कहानी नई नहीं बल्कि सदियों पुरानी है।

पहले भी राजा के मंत्री व सलाहकार रिश्वत लेकर अनैतिक तरीके से कराते थे । राजा की आंख में धूल झोंक जाली ताम्रपत्र तक जारी कर देते थे।

1169 ई. के ताराचंडी शिलालेख में है यह बातें

यह शिलालेख ख्यारवाल वंश के महानायक प्रताप धवल देव द्वारा विक्रम संवत 1225 के ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि यानि 16 अप्रैल 1169 को लिखवाया गया है। 212 सेमी लंबे और 38 सेमी चौड़े पत्थर अंकित यह शिलालेख ताराचंडी देवी प्रतिमा के ठीक उत्तर तरफ स्थित है।

इस शिलालेख में बताया गया है कि राजा विजयचंद्र के मंत्री ने कुम्हउ व बड़ैला गांव को सोनहर के दो लोगों को दान में दिए जाने की घोषणा रिश्वत लेकर राजमोहर लगा ताम्रपत्र जारी कर की गई थी। जैसे ही इस जाली घोषणापत्र का पता चला तो उन्होंने इसे ताम्रपत्र को ही रद कर दिया।

1166 में बना था जाली ताम्रपत्र 

गहड़वाल वंश का जिले का पहला अभिलेख सोनहर का ताम्रपत्र है, जिसे राजा विजयचंद्र के राजमोहर से ताम्रपत्र जारी हुआ था।

यह ताम्रपत्र विक्रम संवत 1223 के भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की नवीं तिथि सोमवार यानी पांच सितंबर 1166 को जारी किया गया था।

इस ताम्रपत्र में सोनहर के दो लोगों को कुम्हउ व बड़ैला गांव दान में दिए जाने की घोषणा की गई है। जिसे महानायक प्रताप धवल देव ने जाली करार दिया।

फ्रांसिस बुकानन ने की थी इस शिलालेख की आधिकारिक खोज

फ्रांसिस बुकानन द्वारा रोहतास में किए गए सर्वेक्षण कार्य में कई शिलालेख व ताम्रपत्रों को खोजने में सफलता मिली थी। 1812-13 में ताराचंडी शिलालेख की खोज भी बुकानन ने की थी।

1823 में हेनरी कालब्रुक ने इसे पढ़ा व आधा-अधूरा अनुवाद कराया था। यह ताम्रपत्र सोनहर निवासी राम खेलावन को खेत जोतते समय प्राप्त हुआ था। 

उसे उनके पौत्र गरीबन महतो ने राष्ट्रीय संपत्ति समझकर 11 मार्च 1959 को पटना के तत्कालीन आयुक्त डा. श्रीधर वासुदेव को सौंप दिया था। तब से यह ताम्रपत्र पटना संग्रहालय में है।

कहते हैं इतिहासकार

ताराचंडी धाम पर महानायक प्रताप धवल देव का शिलालेख देश का पहला शिलालेख है जो लिखित व प्रमाणिक रूप में रिश्वत देकर राजकाज कराने की बात को पुष्टि करता है।इस शिलालेख में रिश्वत लेकर दो गांवों को दान में देने की घोषणा राजा का मुहर लगा ताम्रपत्र से जारी किया गया था। जिसे महानायक ने जाली करार देते हुए ताराचंडी धाम के पास शिलालेख लिखवाया ताकि घूस लेकर गलत दस्तावेज बनाने की बात सभी लोगों तक पहुंच सके। महानायक ने इस शिलालेख में यह भी आदेश दिया था कि कुम्हउ व बड़ैला गांव का राजस्व पूर्ववत उन्हें भी प्राप्त होता रहेगा। शिलालेख संस्कृत में है तथा इसकी लिपि प्रारंभिक नागरी है।

डाॅ. श्याम सुंदर तिवारी, पूर्व शोध अन्वेषक व इतिहासकार, डाॅ. केपी जायसवाल शोध संस्थान


सासाराम में हैं ताराचंडी देवी

सासाराम रोहतास जिला का मुख्यालय है तथा यह पंडित दीन दयाल -गया रेलखंड के बीच प्रमुख रेलवे जंक्शन है। यह वाराणसी से 125 किलोमीटर पूरब एनएच 19 पर है तथा पटना से 160 किलोमीटर दक्षिण है। यहां प्रसिद्ध ताराचंडी देवी हैं, जिन्हें देवी का दायां नेत्र गिरने के कारण इसे ताराचंडी देवी कहा गया है।