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खुद फूस की कुटिया में रहते हैं नागा बाबा, बच्चों के लिए कर दिया खास काम; रोहतास में बन गए मिसाल

Published: Mon, 07 Sep 2026 11:55 AM (IST)

नागा बाबा ने रोहतास के डुमरिया में गरीब बच्चों की शिक्षा हेतु अपनी कीमती जमीन दान की। उनके इस त्याग ...और पढ़ें

दान की जमीन पर बना स्कूल और नागा बाबा।

दान की जमीन पर बना स्कूल और नागा बाबा।

HighLights

  1. नागा बाबा ने बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी जमीन दान की।

  2. उनकी उदारता से 61 अनुसूचित जाति के बच्चे स्कूल जा रहे।

  3. यह दान रोहतास के डुमरिया में बच्चों का भविष्य उज्ज्वल कर रहा।

संवाद सहयोगी, बिक्रमगंज (रोहतास)। दान करने के लिए धन-दौलत नहीं, बड़ा दिल चाहिए। बिक्रमगंज प्रखंड के धनगाईं निवासी राम नरेश दुबे उर्फ नागा बाबा ने इस कहावत को सच कर दिखाया है।

खुद आज भी सड़क किनारे फूस की कुटिया में रहकर जीवन गुजार रहे हैं, लेकिन जब बात गरीब और वंचित बच्चों की पढ़ाई की आई तो उन्होंने अपनी सड़क किनारे की कीमती साढ़े चार डिसमिल जमीन दान करने में तनिक भी संकोच नहीं किया।

उनकी इसी उदारता से डुमरिया अनुसूचित जाति बस्ती के बच्चों के लिए विद्यालय का सपना साकार हो सका। नागा बाबा बेहद साधारण जीवन जीते हैं। पूजा-पाठ कराकर किसी तरह अपनी जीविका चलाते हैं।

चारों धाम समेत देश के कई प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुके हैं। संपत्ति के नाम पर उनके पास करीब तीन बीघा जमीन है। इसी में डुमरिया के पास सड़क किनारे उनकी साढ़े चार डिसमिल जमीन थी। 

जमीन नहीं थी, स्कूल बंद होने की नौबत थी

डुमरिया अनुसूचित जाति बहुल बस्ती है। यहां रहने वाले परिवारों के पास विद्यालय भवन बनाने के लिए जमीन नहीं थी। वर्ष 2006 में नवसृजित प्राथमिक विद्यालय की स्थापना तो हुई, लेकिन भवन निर्माण की राह में भूमि सबसे बड़ी बाधा बन गई। स्थिति ऐसी बन गई थी कि भूमि के अभाव में विद्यालय को किसी दूसरे विद्यालय में समायोजित करने की नौबत आ गई थी।

ग्रामीणों ने जब अपनी परेशानी नागा बाबा के सामने रखी तो उन्होंने अपने स्वार्थ के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने तत्काल अपनी जमीन विद्यालय के लिए देने की सहमति जता दी।

इसके बाद सड़क किनारे स्थित अपनी साढ़े चार डिसमिल जमीन विद्यालय के नाम दान कर दी। सरकारी नाम पर जमीन की रजिस्ट्री कराने में होने वाला खर्च भी उन्होंने खुद उठाया।

आज 61 बच्चे पढ़ रहे, सभी अनुसूचित जाति के

नागा बाबा की ओर से जमीन दान किए जाने के बाद विद्यालय भवन का निर्माण संभव हो सका। आज इसी विद्यालय में 61 बच्चे पढ़ रहे हैं। खास बात यह है कि विद्यालय में अध्ययनरत सभी बच्चे अनुसूचित जाति समुदाय से हैं।

जिन बच्चों के सामने कभी विद्यालय बंद हो जाने का संकट था, आज उन्हीं बच्चों के हाथों में किताबें हैं और आंखों में बेहतर भविष्य के सपने हैं।

बोले नागा बाबा- बच्चे पढ़ेंगे तो देश आगे बढ़ेगा

राम नरेश दुबे उर्फ नागा बाबा कहते हैं कि शिक्षा देश और समाज के विकास का सबसे बड़ा साधन है। डुमरिया के लोग शिक्षा से वंचित हो रहे थे।

वहां अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं और उनके पास विद्यालय के लिए जमीन नहीं थी। ऐसे में उन्होंने सोचा कि यदि उनकी जमीन से बच्चों का भविष्य संवर सकता है तो इससे बड़ा पुण्य का काम और क्या होगा।

वे कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि डुमरिया के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें और समाज व देश का नाम रोशन करें। हालांकि उन्हें इस बात का मलाल है कि कागज पर उनका नाम लिखे जाने के बावजूद अभी तक विद्यालय के नाम में उनका नाम नहीं जोड़ा गया है।

ग्रामीणों ने कहा- जमीन से कहीं बड़ा है उनका योगदान

डुमरिया निवासी बबन राम कहते हैं कि नागा बाबा ने गांव और यहां के बच्चों के लिए बहुत बड़ा काम किया है। यदि उन्होंने जमीन नहीं दी होती तो शायद आज यहां विद्यालय भवन नहीं होता। ग्रामीण उनके इस उपकार को कभी नहीं भूलेंगे।

रामाकांत पासवान, वकील पासवान, जनेश्वर पासवान और लवजी पासवान भी नागा बाबा के कार्य की प्रशंसा करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आर्थिक रूप से साधारण व्यक्ति होने के बावजूद उन्होंने जो किया है, वह बड़े-बड़े संपन्न लोगों के लिए भी प्रेरणा है।

प्रधानाध्यापक बोले- साधारण दिखने वाले व्यक्ति का असाधारण काम

प्रभारी प्रधानाध्यापक रंजीता कुमारी, शिक्षक अजय कुमार कहते हैं कि राम नरेश दुबे ने भूदान कर विद्यालय निर्माण का रास्ता साफ किया। उनके इस कार्य से डुमरिया के नौनिहालों का भविष्य संवर रहा है।

उन्होंने कहा कि नागा बाबा भले ही साधारण जीवन जीते हैं और फूस की कुटिया में रहते हैं, लेकिन बच्चों के लिए जमीन दान कर उन्होंने अपने व्यक्तित्व को असाधारण बना दिया है।

कुटिया छोटी, मगर दिल बहुत बड़ा

नागा बाबा की कहानी सिर्फ जमीन दान करने की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है, जिसमें इंसान अपनी जरूरत से ऊपर उठकर समाज की जरूरत को प्राथमिकता देता है।

जिस व्यक्ति के पास खुद रहने के लिए पक्का मकान नहीं है, उसने बच्चों के लिए सड़क किनारे की कीमती जमीन छोड़ दी। आज डुमरिया के विद्यालय में जब 61 बच्चे पढ़ते हैं तो उनकी हर किताब और हर मुस्कान नागा बाबा के उस त्याग की गवाही देती है।

फूस की छोटी-सी कुटिया में रहने वाले नागा बाबा ने साबित कर दिया कि अमीरी जमीन-जायदाद से नहीं, बल्कि दिल की विशालता से होती है।