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'युवा इतिहासकार स्थानीय इतिहास पर करें शोध', बिहार के मंत्री बोले विश्वविद्यालयों में विकसित हो शोध की परंपरा

Published: Sat, 03 Oct 2026 05:56 PM (IST)

उच्च शिक्षा मंत्री संजय सिंह टाइगर ने युवा इतिहासकारों से विश्वविद्यालयों में स्थानीय इतिहास लेखन की शोध परंपरा विकसित करने का आह्वान किया।

इतिहास लेखन की भारतीय परंपरा विषयक सेमि‍नार को संबोध‍ित करते मंत्री संजय स‍िंंह टाइगर। जागरण

इतिहास लेखन की भारतीय परंपरा विषयक सेमि‍नार को संबोध‍ित करते मंत्री संजय स‍िंंह टाइगर। जागरण

HighLights

  1. उच्च शिक्षा मंत्री ने स्थानीय इतिहास शोध परंपरा विकसित करने का आह्वान किया।

  2. जमुहार में भारतीय इतिहास लेखन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ।

  3. मंत्री ने विकसित भारत के लिए इतिहास के पुनर्लेखन पर बल दिया।

संवाद सहयोगी, डेहरी ऑनसोन (रोहतास)। युवा इतिहासकार विश्वविद्यालयों में स्थानीय इतिहास लेखन की शोध परंपरा को विकसित करें।

यह बात प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री संजय सिंह टाइगर ने शनिवार को जमुहार स्थित गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय में कही।

वे अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के सौजन्य से आयोजित इतिहास लेखन की भारतीय परंपरा विषयक दो दिवसीय दशम युवा इतिहासकार राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन कर रहे थे।

मंत्री ने कहा कि भारत जैसे प्राचीन और विविधतापूर्ण देश में इतिहास को केवल राजाओं के शासन, युद्धों और आंतरिक घटनाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

भारतीय दृष्टि में इतिहास का संबंध धर्म, नीति, लोकजीवन, संस्कृति, प्रकृति, समाज और मानवीय मूल्यों से रहा है। वेदों से लेकर पुराणों तक में तत्कालीन समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक संस्थाओं के स्पष्ट संकेत मिलते हैं।

इतिहास का पुनर्लेखन विकसित भारत के लिए जरूरी

शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा कि आक्रांताओं द्वारा हमारी सभ्यता और संस्कृति पर किए गए आघातों के बाद आज अपनी विरासत को पुनर्स्थापित करने का समय है।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण कार्य इतिहास का पुनर्लेखन है। यदि आने वाली पीढ़ियों तक सच नहीं पहुंचा, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा।

उन्होंने नारायणी नदी (गंडक) का उदाहरण देते हुए कहा कि किस तरह नाम और दृष्टि को बदला गया था, जिसे अब सही रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।

इतिहास राष्ट्र की सामूहिक स्मृति

अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संगठन सचिव बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि छल-प्रपंच से हमारे इतिहास को विकृत किया गया था, लेकिन नई शिक्षा नीति के माध्यम से अब इसे प्रामाणिक, संतुलित और वस्तुनिष्ठ रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि 53 वर्षों से जारी इस प्रयास में युवा इतिहासकारों की भूमिका बेहद अहम है। उद्घाटन सत्र के बाद आयोजित आठ तकनीकी सत्रों में देशभर से आए शोधार्थियों और इतिहासकारों ने 200 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

इनमें भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा, इतिहास के स्रोत, इतिहास-बोध और स्वदेशी पद्धतियों पर व्यापक अकादमिक विमर्श हुआ।

संगोष्ठी के दौरान अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केएन सिंह, विश्वविद्यालय के संस्थापक गोपाल नारायण सिंह, युवा प्रमुख प्रो. विकास सिंह, संगोष्ठी समन्वयक डाॅ. राम प्रकाश शर्मा, संयोजक डाॅ. मुकेश कुमार व डाॅ. निर्मल पांडेय ने भी अपने विचार व्यक्त किए।