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स्क्रीन की चमक में गुम हुई 'ये आकाशवाणी है...' की आवाज! चौपालों पर पसरा सन्नाटा, अपने ही गांव में अजनबी हुए लोग

Published: Thu, 10 Sep 2026 05:59 AM (IST)

Radio Era Forgotten: पूर्णिया के श्रीनगर प्रखंड में स्मार्टफोन के बढ़ते चलन से गांवों की चौपालों पर रेडियो की आवाज ...और पढ़ें

Radio Era Forgotten : गांवों में मौन हुई 'ये आकाशवाणी है...' की गूंज, स्मार्टफोन ने छीनी चौपालों की सामूहिकता

Radio Era Forgotten : गांवों में मौन हुई 'ये आकाशवाणी है...' की गूंज, स्मार्टफोन ने छीनी चौपालों की सामूहिकता

HighLights

  1. रेडियो ने गांवों को जोड़ा, अब स्मार्टफोन ने किया अलग।

  2. पूर्णिया के गांवों में चौपालों पर पसरा सन्नाटा।

  3. लोग अपनी स्क्रीन में खोए, सामाजिक जुड़ाव कम हुआ।

पप्पू कुमार, श्रीनगर (पूर्णिया)। Radio Era Forgotten: एक दौर वह भी था जब सूरज ढलते ही गांव के किसी मचान, दलान या नीम के पेड़ के नीचे बंधी चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते ग्रामीणों की टोली जम जाती थी। बैटरी वाले रेडियो से जैसे ही गंभीर और आत्मीय आवाज में गूंजता था— "ये आकाशवाणी है...", लोग अपने सारे काम छोड़कर कान रेडियो की ओर लगा देते थे।

उस एक डिब्बे से निकलने वाली आवाज सिर्फ देश-दुनिया की सुर्खियां, मौसम का हाल और खेती-किसानी की सलाह ही नहीं देती थी, बल्कि पूरे गांव को एक साझा सूत्र में बांध देती थी। पूर्णिया के श्रीनगर प्रखंड के गांवों में अब रेडियो की वह खनकती आवाज लगभग गुम हो चुकी है। तकनीकी विकास और स्मार्टफोन की चकाचौंध ने चौपालों की वह आत्मीय सामूहिकता छीन ली है।

Purnea Villages Smartphones Silence Radio End Chaupals

स्थानीय बुजुर्ग बद्रीनारायण मेहता, रामसेवक महतो और कारेलाल मेहता बताते हैं कि रेडियो सिर्फ मनोरंजन या सूचना का जरिया नहीं था, बल्कि आपसी मेल-मिलाप का सबसे बड़ा बहाना हुआ करता था। शाम को जब रेडियो बजता था, तो विविध भारती के तराने या प्रादेशिक समाचार सुनने के बहाने लोग जुटते थे। उसी दौरान सुख-दुख साझा होते थे, खेती-बारी के नफे-नुकसान पर चर्चा होती थी और गांव के विवादों का चौपाल पर ही निपटारा हो जाता था।

स्क्रीन में सिमटी दुनिया, चौपालों पर पसरा सन्नाटा

बुजुर्ग बताते हैं कि जैसे-जैसे 4G और 5G स्मार्टफोन का दायरा बढ़ा, घरों और मचानों से रेडियो की आवाज धीमी होती चली गई। आज स्थिति यह है कि जिस दलान पर शाम होते ही दर्जनों लोग ठहाके लगाते दिखते थे, वहां अब वीराना और सन्नाटा पसर गया है। मनोरंजन से लेकर राजनीति और मौसम की जानकारी अब हर किसी की हथेली में मौजूद टच स्क्रीन पर उपलब्ध है।

  • पूर्णिया के श्रीनगर प्रखंड के गांवों में अब नहीं सुनाई देती 'ये आकाशवाणी है...' की जानी-पहचानी गूंज; रेडियो युग लगभग समाप्त

  • शाम ढलते ही मचान और चौपालों पर लगने वाली बैठकी सिमटी; खेती-किसानी और देश-दुनिया के समाचारों के लिए एकमात्र सहारा था रेडियो

  • स्मार्टफोन ने सूचनाएं मुट्ठी में कीं, मगर छीना सामाजिक जुड़ाव; साथ बैठकर भी अपनी-अपनी स्क्रीन में खोए रहते हैं लोग

  • बुजुर्गों का छलका दर्द: पहले एक जगह बैठकर बांटते थे सुख-दुख, अब तकनीक के दौर में पास बैठे लोग भी हुए अजनबी

इस उपलब्धता ने लोगों को इतना आत्ममुग्ध बना दिया है कि वे मोबाइल की स्क्रीन में इस कदर खो जाते हैं कि बगल में कौन बैठा है, इससे किसी को कोई सरोकार नहीं रहता। व्यक्तिगत स्क्रीन ने साझा बातचीत के आनंद को लील लिया है।

पास होकर भी मीलों दूर: साथ बैठे हैं, पर अलग-अलग दुनिया में गुम

मोबाइल ने सूचनाओं की रफ्तार भले ही तेज कर दी हो, लेकिन इंसानी रिश्तों के बीच की डोर को कमजोर किया है। बुजुर्गों का कहना है कि अब यदि कभी-कभार कुछ लोग एक जगह बैठते भी हैं, तो नजरें एक-दूसरे के चेहरों पर नहीं, बल्कि अपने-अपने मोबाइल फोन पर टिकी होती हैं। कोई रील या शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करने में व्यस्त है, तो कोई सोशल मीडिया पर चैट कर रहा है।

बद्रीनारायण मेहता का कहना है कि रेडियो के दौर में लोग एक कार्यक्रम सुनते हुए एक-दूसरे की बातें और मन का हाल भी सुन लेते थे। आज हालात यह हैं कि एक ही कमरे या खाट पर बैठे दो लोग एक-दूसरे से मीलों दूर महसूस होते हैं। तकनीक ने दिनचर्या को आसान जरूर बना दिया, लेकिन गांवों की उस जीवंत चौपाल और साझा संस्कृति की तस्वीर हमेशा के लिए धुंधली कर दी है। रेडियो भले ही आज संग्रहालय या बुजुर्गों के किसी संदूक में महफूज हो, मगर 'ये आकाशवाणी है...' की वह आवाज अब केवल सामूहिक स्मृतियों और पुरानी यादों में ही गूंज रही है।