पूर्णिया। विकास राशि के दुरुपयोग का यह भी एक बड़ा उदाहरण है। शहरी क्षेत्र में ही बीस साल से एक पुल बिना एप्रोच ही खड़ा है, लेकिन इसकी सुधि लेने की जहमत नहीं उठाई गई। फलाफल इस पुल का लाभ भी लोगों को नहीं मिला और पांच हजार की आबादी अब भी इसका दंश झेल रही है। अब पुल का पाया भी ढहने लगा है। लगातार मांग के बाद शुरु हुआ था पुल का निर्माण

शहर के चुनापुर घाट से बक्साघाट जाने वाली सड़क पर मरिया धार में इस पुल का निर्माण कराया गया था। स्थानीय निवासी मकसूदन ऋषि व वार्ड सात के निवर्तमान आयुक्त पोलो पासवान ने बताया कि इस परिक्षेत्र के लोगों की लगातार मांग के बाद तत्कालीन विधायक स्व. राजकिशोर केशरी के कोटे से इस पुल का निर्माण शुरु हुआ था। पुल का निर्माण युद्धस्तर पर चल रहा था। कोई मधुसूदन सिंह नामक संवेदक था, जिसकी बाद में मौत हो गई। तब से न तो कोई जनप्रतिनिधि और न ही अधिकारी इस ओर झांकने आए हैं। उन लोगों ने इस पुल के निर्माण कार्य को पूर्ण कराने के लिए हर दर पर दस्तक दी लेकिन परिणाम शून्य रहा। बारिश होते ही इस पथ पर बंद हो जाता है आवागमन

यह पथ चुनापुर घाट से बक्साघाट होते हुए मरंगा में जा मिलती है। इस पुल के दोनों ओर लगभग एक दर्जन मोहल्ले बसे हुए हैं। सुखाड़ में पुल के दक्षिण भाग के लोग इसी पथ से सहजता से चुनापुर घाट तक पहुंच जाते हैं और उत्तरी भाग के लोग बिना मुख्य शहर में प्रवेश किए ही मरंगा व हरदा चले जाते हैं। बारिश में लोगों के लिए इस होकर आवागमन दुष्कर हो जाता है। शहर की जलनिकासी का है मुख्य स्त्रोत

जहां यह पुल का निर्माण हुआ है, वह शहर की जल निकासी का मुख्य स्त्रोत है। इस होकर एक प्राकृतिक नाला गुजरती है और खासकर शहर के दक्षिणी व पश्चिमी परिक्षेत्र का पानी इसी होकर निकलता है। यद्यपि शनै:- शनै: यह नाला भी अतिक्रमित होता जा रहा है। अब भी बारिश होने पर यहां कमर भर पानी रहता है और इसका सीधा जुड़ाव कारी कोसी से है। ऐसे में इस होकर लोगों को गुजरना मुश्किल हो जाता है। जमींदोज हो चुका है बोर्ड, विभाग भी बेखबर

पुल निर्माण को लेकर वहां लगा बोर्ड भी अब जमींदोज हो चुका है। इसकी प्राक्कलित राशि या निर्माण को लेकर अन्य जानकारी भी अब किसी के पास नहीं है। जिला योजना विभाग भी इसे पुराना मामला बता पल्ला झाड़ लेते हैं।