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बांग्लादेश से जूट तस्करी रुकते ही चमकी सीमांचल की किस्मत, 12000 रुपये क्विंटल तक पहुंचे दाम

Published: Thu, 22 Oct 2026 06:23 PM (IST)

पश्चिम बंगाल से सटी बांग्लादेश सीमा पर सख्ती से जूट तस्करी रुकी है, जिससे सीमांचल में जूट की खेती 15 हजार हेक्टेयर तक बढ़ गई है।

जूट की खेती। (जागरण)

जूट की खेती। (जागरण)

HighLights

  1. सीमा पर सख्ती से जूट तस्करी पर अंकुश लगा।

  2. सीमांचल में जूट की खेती 15 हजार हेक्टेयर तक बढ़ी।

  3. जूट की अच्छी कीमत से किसानों को आर्थिक लाभ।

प्रकाश वत्स, पूर्णिया। पश्चिम बंगाल से जुड़ती बांग्लादेश की सीमा पर परिस्थितियां तेजी से बदल रही है। कई कृषि उत्पाद के साथ-साथ हथियार व मादक द्रव्यों की बेधड़क तस्करी पर अंकुश लग रहा है।

विशेषकर जूट की तस्करी पर अंकुश से इस बार सीमांचल की खेती को खूब बदली है। दो-चार हजार हेक्टेयर पर सिमटी जूट की खेती इस बार 15 हजार हेक्टेयर में हुई।

जूट उत्पादक किसानों की संख्या भी बढ़ी। जूट की अच्छी कीमत के कारण इस बार धान बौना पड़ा है। मक्का बुआई के लिए आर्थिक जद़्दोजहद अबकी जूट उत्पादन करने वाले किसानों को नहीं है। इस चलते समय से पहले ही मक्के की बुआई शुरु हो गई है।

अचानक बढ़ी जूट की डिमांड, औसतन 12000 क्विंटल तक बिका

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनने का प्रभाव भी इसे कहा जा रहा है। केंद्र सरकार भी लगातार सीमांचल में सरहद को लेकर पूर्व से गंभीर रही है।

पश्चिम बंगाल में जूट फैक्ट्रियों की अच्छी संख्या है और इससे जुड़ा बड़ा बहु बाजार वहां की आर्थिक स्थिति का बड़ा आधार भी है।

कंपनियां शनैं: शनै: बांग्लादेश से तस्करी से आ रही जूट पर निर्भर थी। इस चलते सीमांचल में जूट की खेती का सिमटा दायरा से कंपनियां अप्रभावित थी।

अब सीमा पर सख्ती से बांग्लादेश से जूट आना बंद है और कंपनियों में स्थानीय जूट की डिमांड बढ़ गई है। इस चलते कीमत भी औसतन 12 हजार रुपये क्विंटल के करीब रहा।

कम पड़ जाएंगे सड़नताल

इस बार जूट की खेती करने वाले किसान प्रमोद साह बताते हैं कि यह बड़े परिवर्तन की शुरुआत है। खेतों की कहानी फिर करवट लेने वाली है।

धान का रकवा यहां सिमटेगा। जूट की कीमत अगर अगले साल भी यही रहा तो सीमांचल में धान हाशिए पर चला जाएगा। बीस साल पहले यहां जूट ही नकदी फसल थी और सीमांचल जूट नगरी के रुप में जाना जाता था।

यहां की साहित्य व संस्कृति में भी वह खूशबू बकरार है। कम कीमत व सड़नताल की होने लगी कमी ने किसानों को इस खेती से विमुख कर दिया। अगर स्थिति यह रही तो दो चार साल में ही जूट गलाने की समस्या एक बार फिर मुंह बाए खड़ी रहेगी।

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