जागरण संवाददाता, पूर्णिया। जब नया घर बन रहा होता है तो प्लास्टिक की झोपड़ी में भी रात गुजारते हैं लोग। कल को अस्पताल बनेगा तो बेड भी मिलेगा और कंबल भी। एक पहलू यह भी है कि 55 हजार के एक-एक आइसीयू बेड से भरे पड़े लाइन बाजार में वीआइपी अस्पताल होने के बाद भी कड़ाके की ठंड में जमीन पर सोकर मरीज हमारे अस्पताल के कर्मठ और सुयोग्य चिकित्सक व सिस्टर से इलाज कराते हैं। ये तारीफ की बात है साहब। वैसे कोविड वार्ड का बेड खाली पड़ा है। भगवान न करे उस वाले बेड की किसी को जरूरत भी पड़े।

चौंकिए मत..। यह राजकीय मेडिकल कालेज सह अस्पताल के अधीक्षक डा. विजय कुमार की उस स्थिति पर प्रतिक्रिया है, जो मानवीय संवेदना को झकझोर देता है। अस्पताल में बेड की कमी से बरामदे पर घर से लाई गई चादर पर प्रसूता को ठंड की रात गुजारनी पड़ रही है। अस्पताल में ऐसे मरीजों को घर से बेड आदि लेकर आने की सलाह दी जाती है और फिर इस स्थिति पर अधीक्षक का जबाब आता है। दैनिक जागरण में मरीजों के इस दर्द को प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने पर अधीक्षक ने व्हाट्सएप पर दार्शनिक अंदाज में जबाब प्रेषित किया है। शायद अधीक्षक को यह अहसास भी नहीं रहा कि सरकार वैसे लाचार लोगों के लिए भारी-भरकम बजट स्वास्थ्य सेवा पर खर्च कर रही है, जो निजी अस्पताल में अपना इलाज कराने को असमर्थ हैं। अस्पताल में व्याप्त कुव्यवस्था पर ठोस पहल करने की बजाय अधीक्षक स्थिति की दुहाई देकर खुद का पीठ थपथपाने में जुटे हुए हैं।

यूं भी अस्पताल में इमरजेंसी के साथ प्रसव वार्ड की सबसे ज्यादा अहमियत होती है। जिले के लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा के लिहाज से यह सबसे बड़ा सहारा है। अधिकांश पीएचसी से भी प्रसव के मरीजों को मेडिकल कालेज रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में निश्चित रूप से यहां मरीजों का दबाव अधिक होता है, लेकिन व्यवस्था अपडेट करने की बजाय अधीक्षक द्वारा इस तरह के उत्तर दिए जा रहे हैं। बरामदे पर रात गुजारने वाले मरीज के स्वजन विनय कुमार, आसिफ व अन्य ने बताया कि देर रात ठंड बढ़ जाने के बाद उनके मरीज सहित सभी लोगों को बैठकर रात गुजारनी पड़ी। घर से इस आशा में महज एक चादर व कंबल लेकर आए थे कि अस्पताल में सब कुछ मिल ही जाएगा। यहां स्वास्थ्य कर्मी भी उन्हीं लोगों को डांट रहे थे कि जब इतनी ठंड पड़ रही है तो पूरा इंतजाम कर क्यों नहीं आए थे। इतना ही नहीं जिस स्थिति में उन लोगों को रहना पड़ा, उससे संक्रमण का खतरा भी बना हुआ था। उन लोगों की माली हालत ऐसी नहीं है कि वे लोग निजी अस्पताल में जा सकते हैं। जिला प्रशासन को इस मामले में पहल करनी चाहिए। विधायक व सांसद भी नहीं आते झांकने, डाक्टरों की चलती है मनमानी

दो दिनों तक प्रसव पीड़िता पत्नी के साथ बरामदे पर रात गुजारने के बाद घर जा रहे कमल कुमार का मन तो रोष से भरा पड़ा था। एक सवाल पर मानों वह उबल ही पड़े। उन्होंने कहा कि यह स्थिति नहीं रहेगी तो क्या होगा। कभी विधायक व सांसद तक यहां झांकने नहीं आते हैं। यहां तो डाक्टरों की मनमानी चलती है। विधायक, सांसद या फिर अन्य सक्षम जन प्रतिनिधियों व अधिकारियों का अगर औचक निरीक्षक होता रहता तो आज यह स्थिति नहीं रहती।

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