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खेत में कौड़ी... बाजार में सोना! वैश्विक मंदी और सिंडिकेट के खेल में फंसा पूर्णिया का मखाना; 16 हजार से नीचे आया दाम

Published: Fri, 04 Sep 2026 01:56 PM (IST)

Purnea Makhana Price Crash: पूर्णिया के मखाना किसान कम कीमतों और बिचौलियों के सिंडिकेट के कारण संकट में हैं, जहाँ ...और पढ़ें

Purnea Makhana Price Crash: पूर्णिया के खेत से मखाना गुड़ी निकालते किसान।

Purnea Makhana Price Crash: पूर्णिया के खेत से मखाना गुड़ी निकालते किसान।

HighLights

  1. मखाना की कीमतें 16 हजार रुपये प्रति क्विंटल से नीचे।

  2. किसानों को उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा।

  3. सरकार से मखाना के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग।

जागरण संवाददाता, पूर्णिया। Purnea Makhana Price Crash: देश और दुनिया के बाजारों में अपनी खास पौष्टिकता और स्वाद से सिल्क सिटी और मिथिलांचल का डंका बजाने वाले पूर्णिया के मखाना उत्पादक किसान आज बेबसी के आंसू रोने को विवश हैं। मानसून की बेरुखी और भीषण सूखे जैसे हालात के बीच किसानों ने खून-पसीना एक कर महंगे पटवन के सहारे मखाना तो उपजा लिया, लेकिन जब खेतों से फसल निकालकर बेचने का वक्त आया तो बाजार में व्यापारियों ने इसके कौड़ी के भाव लगा दिए हैं।

सितंबर के पहले हफ्ते में मखाना बाजार में सुधार की आस लगाए बैठे किसानों की उम्मीदें अब पूरी तरह टूटने लगी हैं। थोक बाजार में गुड़ी (मखाना का कच्चा बीज) की कीमत अब भी 16 हजार रुपये प्रति क्विंटल के पार नहीं पहुंच सकी है। इस औंधे मुंह गिरे भाव से मुनाफा तो दूर, किसानों के लिए खेती की मूल लागत निकालना भी दूभर हो गया है। किसानों के मुताबिक, जब तक गुड़ी का न्यूनतम भाव 20 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक नहीं पहुंचता, तब तक उन्हें कोई राहत नहीं मिल सकती।

  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले पूर्णिया के मखाना उत्पादकों को नहीं मिल रहा लागत मूल्य; 16 हजार रुपये प्रति क्विंटल पर अटका गुड़ी का भाव

  • गत वर्ष 1.5 से 2 लाख रुपये प्रति बीघा बिके थे खेत, इस बार 80 हजार रुपये बीघा पर भी खरीदार मिलने मुश्किल

  • अमेरिका की नई टैरिफ नीति और वैश्विक संकट से निर्यात प्रभावित, स्थानीय व्यापारियों की मनमानी से किसानों में आक्रोश

  • कोसी-सीमांचल में 35 हजार हेक्टेयर तक बढ़ा रकबा; किसानों ने धान-गेहूं की तर्ज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने की उठाई मांग

हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल जहां व्यापारी डेढ़ से दो लाख रुपये प्रति बीघा के हिसाब से खड़ी फसल का सौदा कर रहे थे, वहीं इस बार 80 हजार रुपये प्रति बीघा पर भी कोई तैयार नहीं दिख रहा।

35 हजार हेक्टेयर पहुंचा रकबा, सरकारी नियंत्रण न होने से सिंडिकेट हावी

वैश्विक फलक पर लगातार बढ़ती मांग और भोला पासवान शास्त्री कृषि कॉलेज के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित उन्नत 'सबौर मखाना-1' प्रजाति की सफलता से उत्साहित होकर किसानों ने इस बार रिकॉर्ड रकबे में मखाना लगाया था। आंकड़ों के अनुसार, सीमांचल और कोसी प्रमंडल के जिलों में पिछले साल जहां 28 हजार हेक्टेयर में मखाना लगा था, वहीं इस बार यह दायरा बढ़कर 35 हजार हेक्टेयर के पार पहुंच गया। अकेले पूर्णिया जिले में ही रकबा करीब डेढ़ गुना बढ़कर 15 हजार हेक्टेयर हो गया।

दुनिया के कुल उत्पादन का 90 प्रतिशत मखाना बिहार देता है, जिसमें से 80 फीसदी उत्पादन अकेले सीमांचल और मिथिलांचल से होता है। इसके बावजूद बाजार पर सरकारी मूल्य नियंत्रण की कोई व्यवस्था न होने से बिचौलियों और बड़े व्यापारियों का सिंडिकेट मनमाने भाव पर खरीद कर किसानों का शोषण कर रहा है।

हरदा मंडी से तय होता है देश का भाव, वैश्विक संकट से थमा निर्यात

उच्च गुणवत्ता और 'मिथिला मखाना' को मिले जीआई टैग (GI Tag) की बदौलत पूर्णिया का हरदा बाजार देश की सबसे बड़ी मखाना मंडी बन चुका है। यहां से सालाना करीब 35 हजार मीट्रिक टन मखाना का कारोबार होता है, जिसका कुल टर्नओवर 250 से 300 करोड़ रुपये है।

कारोबारियों के अनुसार, हाल ही में अमेरिका द्वारा लागू की गई नई टैरिफ नीति और मध्य-पूर्व के वैश्विक तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय निर्यात पर गहरा असर पड़ा है। बाहर के बड़े निर्यातकों और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के सीधे पूर्णिया न पहुंचने के कारण स्थानीय व्यापारियों की मनमानी बढ़ गई है, जिसका सीधा खामियाजा स्थानीय उत्पादकों को भुगतना पड़ रहा है।

धान-गेहूं की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करे सरकार: किसान

श्रीनगर प्रखंड के चनका निवासी किसान अनिल झा ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि पिछले साल के अच्छे मुनाफे को देखकर उन्होंने पांच बीघे में खेती की थी। कमजोर बारिश के चलते हर चौथे-पांचवें दिन बोरिंग से महंगा पानी देना पड़ा। खाद, बीज और तालाब से गुड़ी निकालने में अत्यधिक मजदूरी खर्च हुई। अब जब फसल घर आई तो भाव गिरा दिया गया। जब तक सरकार मखाना की न्यूनतम दर निर्धारित नहीं करेगी, तब तक बिचौलिए किसानों की जेब काटते रहेंगे।

वहीं खुट्टी हसेली के किसान एनुल हक का कहना है कि जब तक उपज किसान के खेत और खलिहान में रहती है, तब तक भाव गिराकर रखा जाता है। जैसे ही मखाना व्यापारियों के गोदामों में पहुंचेगा, इसके दाम दो से चार गुना बढ़ा दिए जाएंगे। उन्होंने मांग की कि मखाना को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के दायरे में लाया जाए, ताकि अन्नदाता को उसकी मेहनत का वाजिब हक मिल सके।