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उल्टी धारा से पूर्णिया में जलप्रलय! फरक्का जलसंधि पर उठी बहस; गंगा की सिल्ट बनी ब‍िहार का काल, कोसी में भी उफान

Published: Sun, 13 Sep 2026 01:06 PM (IST)

Purnea Flood Farakka Accord Silt Issue: पूर्णिया में गंगा के बैकवाटर और तलहटी में जमा गाद के कारण भयंकर बाढ़ ...और पढ़ें

Purnea Flood Farakka Accord Silt Issue: पूर्णिया में कोसी के बैक वाटर और सिल्ट ने बढ़ाई बाढ़ की त्रासदी; नदियों के संगम और फरक्का जलसंधि पर गरमाई सियासत

Purnea Flood Farakka Accord Silt Issue: पूर्णिया में कोसी के बैक वाटर और सिल्ट ने बढ़ाई बाढ़ की त्रासदी; नदियों के संगम और फरक्का जलसंधि पर गरमाई सियासत

HighLights

  1. पूर्णिया में गंगा के बैकवाटर और सिल्ट से भयंकर बाढ़।

  2. रुपौली प्रखंड की 10 पंचायतें पूरी तरह जलमग्न, फसलें तबाह।

  3. फरक्का जलसंधि और गंगा सिल्ट पर राजनीतिक बहस तेज।

जागरण संवाददाता, पूर्णिया। Purnea Flood Farakka Accord Silt Issue: सीमांचल और कोसी के मुहाने पर बसे पूर्णिया जिले में इस वर्ष बाढ़ केवल नदियों के सीधे उफान से नहीं, बल्कि गंगा के ‘बैक वाटर’ (उल्टी धारा) और तलहटी में जमा खतरनाक सिल्ट (गाद) के चलते भयानक रूप ले चुकी है। पूर्णिया का रुपौली प्रखंड वर्तमान में इस त्रासदी का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां की 10 पंचायतें पूरी तरह जलमग्न हैं। बाढ़ के पानी ने जहां सैकड़ों परिवारों के घर-द्वार उजाड़ दिए हैं, वहीं हजारों एकड़ में लगी फसलें तबाह हो चुकी हैं।

दूसरी ओर बायसी अनुमंडल क्षेत्र के लोग, जहां से महानंदा, परमान, कनकई, दास और बकरा जैसी दर्जनभर नदियां गुजरती हैं, कोसी के तांडव और कटाव को देखकर सहमे हुए हैं। इसी मानवीय संकट के बीच अब राजनीतिक गलियारों में 'फरक्का जलसंधि' और गंगा में जमा सिल्ट का मुद्दा गांव-गांव गूंजने लगा है।

बैक वाटर का गणित: संगम पर गंगा भारी, कोसी बेबस

जल विशेषज्ञों और भौगोलिक अध्ययनों के अनुसार, कोसी नदी मधेपुरा से निकलकर पूर्णिया के रुपौली होते हुए कटिहार जिले में प्रवेश करती है और अंततः गंगा में विलीन हो जाती है। पूर्णिया और कटिहार के बीच का यह फासला लगभग 70 किलोमीटर का है। इसी तरह सीमांचल की कई छोटी-बड़ी नदियों को अपनी गोद में समेटने वाली महानंदा नदी भी करीब 100 किलोमीटर का सफर तय कर गंगा की मुख्य धारा में समाहित होती है। महानंदा में चार प्रमुख नदियों का संगम पूर्णिया की सीमा में ही होता है।

  • पूर्णिया के रुपौली प्रखंड की 10 पंचायतें कोसी के बैक वाटर में जलमग्न; गंगा के बढ़े जलस्तर से उल्टी धारा बनी तबाही की वजह

  • महानंदा, परमान, कनकई, दास, बकरा व कारी कोसी जैसी नदियों का अंतिम पड़ाव गंगा; सिल्ट जमने से जल निकासी पूरी तरह बाधित

  • फरक्का बैराज और जलसंधि को लेकर राजनीतिक गलियारों में गरमाई बहस; जदयू ने गंगा की अविरलता को लेकर छेड़ा अभियान

  • नदी शोधकर्ता भगवान पाठक का बयान— नदियों में किसी भी तरह का कृत्रिम अवरोध घातक, गंगा की अविरलता से ही बचेगा सीमांचल

इस बार रुपौली में आई जलप्रलय का मुख्य कारण 'बैक रिवर फ्लो' रहा है। दरअसल, जब संगम स्थल पर गंगा का जलस्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, तो सहायक नदियों का पानी आगे नहीं बढ़ पाता। नतीजतन, गंगा का भारी जल दबाव इन नदियों के पानी को पीछे (उल्टी दिशा में) धकेलता है। जब यह स्थिति कई दिनों तक लगातार बनी रहती है, तो निचले रिहायशी इलाकों और खेतों में पानी का फैलाव विकराल हो जाता है।

सिल्ट की परत बनी जानलेवा, फरक्का पर जदयू आक्रामक

बाढ़ के दौरान गंगा का जलस्तर बढ़ते ही उसमें मिलने वाली सहायक नदियों की जलधारा धीमी और कमजोर पड़ जाती है। धारा कमजोर होते ही पानी के साथ बहकर आने वाली मिट्टी और गाद (सिल्ट) तलहटी में जमने लगती है। जानकारों के मुताबिक, वर्षों से गाद की यह परत अब घातक स्तर तक पहुंच चुकी है, जिससे नदियों की जल-वहन क्षमता आधी से भी कम रह गई है।

पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस भयानक सिल्टेशन की एक बड़ी वजह फरक्का बराज और उससे जुड़ी व्यवस्थाएं हैं। इस मुद्दे पर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने व्यापक अभियान शुरू कर दिया है, जिससे राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया है। बाढ़ प्रभावित इलाकों के आम लोग भी अब इस बात को लेकर सतर्क और मुखर हो रहे हैं कि आखिर हर साल उनकी बस्तियां जलमग्न क्यों हो रही हैं।

गंगा की अविरलता में ही सीमांचल की सुरक्षा: शोधकर्ता

कोसी की नदियों पर लंबे समय से अध्ययन कर रहे शोधकर्ता भगवान पाठक का कहना है कि नदियों की प्राकृतिक धारा में किसी भी प्रकार का मानवीय या ढांचागत अवरोध उनके स्वाभाविक स्वरूप और जल-पारिस्थितिकी को नष्ट कर देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल फरक्का जलसंधि ही नहीं, बल्कि जल प्रवाह को रोकने वाले सभी अवरोधों पर वैज्ञानिक और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की नितांत आवश्यकता है।

कोसी और सीमांचल पूरी तरह बाढ़ प्रभावित संवेदनशील क्षेत्र हैं। यहां से गुजरने वाली हर छोटी-बड़ी नदी का अंतिम पड़ाव गंगा ही है। इसलिए गंगा जितनी स्वच्छ और अविरल (बाधा रहित) होगी, सहायक नदियों का पानी उतनी ही तेजी से निकलेगा और इस पूरे क्षेत्र को बाढ़-कटाव की विभीषिका से स्थायी राहत मिल सकेगी।

नदियों की धारा में किसी भी प्रकार का अवरोध उनकी प्राकृतिक व स्वभाविक सुंदरता को विनष्ट करती है। फरक्का जलसंधि ही नहीं अन्य अवरोधों पर भी सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है। कोसी व सीमांचल बाढ़ प्रभावित इलाका है। यहां से गुजरने वाली नदियों का अंतिम पड़ाव गंगा ही है। गंगा जितनी अविरल होगी, इस क्षेत्र को उतना लाभ मिलेगा।

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भगवान पाठक, शोध कर्ता