मेरे नानाजी किशनदेव झा काफी सरल और सुलझे हुए व्यक्ति थे। उनके जीवन का एक ही मूलमंत्र था कि हम किसी को केवल उपदेश देकर अपनी बातें नहीं मनवा सकते। इसकी बजाय हमें अपने काम के जरिए उन्हें यकीन दिलाना होगा कि यह संभव हो सकता है। मेरे नाना जी अहले सुबह उठ जाते थे, उन्हें देखकर मैं स्वत: उठ जाता था। फिर उनके साथ बैठकर रामचरित्रमानस का पाठ के बाद में व्यायाम करता था। मुझे क्रिकेट खेलने में काफी मन लगता था, लेकिन मेरे परिवार के लोग मेरे क्रिकेट खेलने के समर्थन में नहीं थे। पर मेरे नाना जी मेरे साथ चट्टान की भाति खड़े हो जाते थे और घर के सदस्यों को कहते थे की बच्चे को जिस चीज में मन लगता है करने दो एक ना एक दिन अपना रास्ता खुद बना लेगा। आज मेरे नानाजी मेरे साथ नही है लेकिन हर पल मुझे उनकी कमी महसुस होती है। कभी-कभी जिदंगी के आपाधापी से थक जाता हुं तो नानाजी की काफी याद आती है।

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