पूर्णिया। लोजपा नेता अनिल उरांव का अपहरण बाद फिरौती वसूलकर हत्या के मामले को सुलझाना पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। अपहरण की जानकारी रहते पुलिस ना लोजपा नेता की जान बचा पाई और ना हत्या बाद फिरौती की राशि बरामद कर पाई। शातिर अपराधियों द्वारा घटना को योजना के अनुसार अंजाम देने के बाद सिर्फ घटना में संलिप्त पांच मुख्य अपराधी सहित चार अन्य को गिरफ्तार कर पुलिस सफल उछ्वेदन की बात कह रही है, लेकिन हर ओर घटना में पुलिस की नाकामी की चर्चा हो रही है। ऐसे में प्रदेश स्तर के बड़े नेता की पुलिस के आंख के सामने अपहरण कर फिरौत वसूलकर अपराधियों ने हत्या कर दी।

गिरफ्तार शातिर अपराधी से पूछताछ पुलिस घटना के संबंध में सभी जानकारी हासिल करने के लिए मुंह तक नहीं खुलवा पाई। अपराधी पूरी घटना को अंजाम दे दिया और पुलिस मूकदर्शक की तरह सड़क पर दौड़ लगाती रही और तकनीकी अनुसंधान का हवाला देकर गिरफ्तारी बाद अपनी पीठ थपथपा रही है। शायद यह घटना भी पूर्णिया के इतिहास में पुलिस की असफलता का एक कहानी बनकर रहेगी। हाल के वर्षों में ऐसी घटना नहीं हुई थी जिसमें पुलिस रिपोर्ट कराने के बाद भी अपराधी 10 लाख रुपये फिरौती वसूलकर लोजपा के आदिवासी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष को मौत के घाट उतार दिया गया।

राजनीतिक लोगों ने पुलिस को उलझाया::

लोजपा नेता के अपहरण बाद सक्रिय राजनीतिक लोगों ने पुलिस को अपने कथनानुसार उलझाकर रखा। इतना ही नहीं घटना के बाद भी कुछ राजनीतिक लोग अपना हित साधने के लिए भू माफिया का मुद्दा उठाकर पुलिस के जांच के दिशा को भटकाने की कोशिश की। जमीन कारोबार से जुड़े कई लोगों के नाम तक उछाला गया, ताकि पुलिस पर दबाव बनाकर अपने विरोधी को केस में उलझा सके। पुलिस ऐसे राजनीति करने वाले लोगों की बात तो सुनी लेकिन तकनीकी अनुसंधान के जरिए जांच को जारी रखा। निष्कर्ष यह निकला कि मामला भू माफिया से नहीं बल्कि महिला के चक्कर में अनिल उरांव की जान गई है।