अरुण अशेष, पटना:  विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) के सर्वेसर्वा मुकेश सहनी छह के बदले डेढ़ साल की मियाद वाली विधान परिषद की सदस्यता के लिए मजबूरी में ही राजी हुए। शनिवार को जब घोषणा हुई कि उन्हें डेढ़ साल की मियाद वाली परिषद की सीट मिलेगी तो वे मुकर गए। लेकिन, अगले ही दिन उन्होंने अपनी रजामंदी जाहिर की। ट्वीट कर बताया कि गृह मंत्री अमित शाह के कहने पर वे परिषद की सदस्यता के लिए नॉमिनेशन करेंगे। उसके अगले दिन यानी सोमवार को उन्होंने पर्चा भर दिया। 21 जनवरी को उनका निर्विरोध निर्वाचन हो जाएगा। बिहार सरकार में मंत्री तो पहले से हैं। सच यह है कि उन्हें यह भी नहीं मिलता तो सरकार का कुछ बिगाड़ नहीं पाते। विधायकों के कमांड से बाहर चले जाने के कारण एनडीए नेतृत्व पर दबाव बनाने की क्षमता उनमें नहीं रह गई है। 

मंत्री बनने के बाद सदन का सदस्य होना था जरूरी

विधान परिषद की दो सीटें रिक्त हैं। परिषद के सदस्य सुशील कुमार मोदी राज्यसभा में चले गए। विनोद नारायण झा विधानसभा के सदस्य बन गए। दोनों भाजपा के हैं। लिहाजा उप चुनाव में उम्मीदवारी तय करने की जिम्मेवारी भाजपा की थी। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने विकासशील इंसान पार्टी को परिषद की एक सीट देने का करार किया था। करार के समय यह समझ बनी थी कि मुकेश सहनी तो विधानसभा चुनाव जीत ही जाएंगे। परिषद की सीट किसी कार्यकर्ता या दूसरी कतार के नेता को दी जाएगी। मुकेश हार गए। मंत्री बन गए तो उनके लिए किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी है। 

क्यों नहीं मिला भाव

सहनी खुद विधान सभा का चुनाव हार गए। उनकी पार्टी के चार उम्मीदवार जीत गए। विधानसभा की जैसी संरचना है, उसमें वीआइपी के चार विधायकों के समर्थन के बगैर सरकार नहीं चल सकती है। इस गणित से पार्टी अध्यक्ष होने मुकेश सहनी बेहद प्रभावशाली हैं। सवाल उठा कि इतने प्रभावशाली व्यक्ति की एनडीए ने क्यों नहीं परवाह की। अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि एनडीए और खासकर भाजपा की रणनीति के सामने मुकेश सहनी टिक नहीं पाए। वे इतने मजबूर हो गए कि परिषद की डेढ़ साल वाली सीट भी नहीं दी जाती तब भी वे सरकार का कुछ बिगाड़ नहीं पाते।

यह नौबत क्यों आई

असल में विकासशील इंसान पार्टी के चार में से तीन विधायक-राजू कुमार सिंह, मिश्री लाल यादव और स्वर्णा सिंह पहले से भाजपा या जदयू के साथ रहे हैं। इन विधायकों को टिकट देकर मुकेश सहनी ने इन पर कृपा नहीं की। भाजपा ने इस शर्त के साथ सहनी को सीटें दी थीं कि टिकट उन्हीं को मिलेगा, जिसकी सिफारिश पार्टी करेगी। सिर्फ चौथे विधायक मुसाफिर पासवान राजद पृष्ठभूमि से हैं। ये विधायक जीत कर आते ही भाजपा से जुड़ गए। चार सदस्यीय विधायक दल में तीन की ही मर्जी चलेगी। लिहाजा, मुकेश सहनी का इन विधायकों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। ये सब भाजपा से निर्देशित हो रहे हैं। ऐसे में मुकेश अपनी पार्टी के विधायकों के दम पर एनडीए नेतृत्व पर दबाव बनाने की क्षमता खो चुके हैं। ऐसे में दबाव के बदले अहसान के तौर पर उनका उनका नाम आगे किया गया है।

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