पटना, कुमार रजत। वशिष्ठ बाबू जिंदा होते तो कुछ और बात होती। फिर भी 'समथिंग इज बेटर दैन नथिंग। (कुछ नहीं से कुछ होना बेहतर है)।' गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह को पद्मश्री सम्मान मिलने पर उनके छोटे भाई अयोध्या प्रसाद सिंह ने कुछ ऐसे ही प्रतिक्रिया दी। वशिष्‍ठ बाबू को शनिवार को पद्म श्री सम्‍मान देने की घोषणा की गई है। इसके बाद उनके भाई ने जागरण से बात की। 

पिछले साल अक्टूबर में जब वशिष्ठ बाबू बीमार पड़े और पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) में भर्ती थे तो उनके छोटे भाई अयोध्या प्रसाद सिंह ने जागरण से कहा था- 'वशिष्ठ बाबू का इतना नाम है। पटना विश्वविद्यालय से लेकर अमेरिका के बर्कले विवि तक चर्चा में रहे। आइआइटी में पढ़ाया। गणित की थ्योरी को लेकर दुनिया भर में चर्चा में रहे मगर बिहार के लाल को यहां के लोग ही भूल चुके हैं। आज तक एक भी सम्मान नहीं मिला। बिहार रत्न तक देना किसी ने जरूरी नहीं समझा। इस बार पद्मश्री के लिए कई संस्थाओं ने नाम प्रस्तावित किया है। जिंदा रहते सम्मान मिल जाए तो अच्छा लगेगा।' 

 अफसोस, इस बीच 14 नवंबर को वशिष्ठ बाबू का देहांत हो गया।  अयोध्या बाबू कहते हैं, सरकार को शुक्रिया मगर एक आग्रह और है। कोईलवर के पास बन रहे नए सिक्स लेन पुल का नाम वशिष्ठ बाबू के नाम पर हो जाए तो अच्छा लगेगा। आरा के सांसद एवं केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने भी भरोसा दिया है कि वे केंद्र सरकार से बात करेंगे। हां, राज्य सरकार को एक प्रस्ताव भर देना होगा। 

 वशिष्ठ बाबू के साथ रहकर उनकी सेवा करने वाले भतीजे राकेश कहते हैं, 'उम्मीद तो पद्मभूषण की थी मगर पद्मश्री मिला तो ये भी ठीक ही है। खुशी है, देर से ही सही इतिहास के पन्नों में वशिष्ठ चाचा का नाम जुड़ रहा है।

Posted By: Rajesh Thakur

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