प्रभात रंजन, पटना। अपनी शहनाई से सबके दिलों में मिठास घोलने वाले देश के मशहूर शहनाई वादक और भारतरत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्ला खां बिहार की धरती के अनमोल रत्न थे। शहनाई वादन को उन्होंने देश और दुनिया में नई ऊंचाइयां दीं। उनकी प्रस्तुति से पटना शहर भी अछूता नहीं रहा। दशहरे के मौके पर शहर में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में उस्ताद ने शहनाई वादन से श्रोताओं को न केवल आनंदित किया बल्कि लोगों के दिलों में शहनाई की मिठास घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उस्ताद बिस्मिल्ला खां का जन्म बिहार के शाहाबाद (अब बक्सर) जिले के अंतर्गत डुमरांव कस्बे में 21 मार्च 1916 को पैगंबर खां के घर हुआ था। उनके जन्म पर बिस्मिल्ला खां के दादा रसूल बख्श खां ने उन्हें देखकर ‘बिस्मिल्ला’ कहा था, जिसका अर्थ श्रीगणोश करना है। बाद में उनका नाम बिस्मिल्ला ही रख दिया गया। ऐसे उनका एक और नाम ‘कमरूद्दीन’ था। उनकी जीवन यात्र अपने आप में बेमिसाल है। जिस इंसान को फूंक में आनंद की अनुभूति होती थी वह इंसान नहीं बल्कि फरिश्ता था। उस्ताद की नजरों में धर्म ही संगीत था। उस्ताद की प्रस्तुति को पटना के लोगों ने न केवल करीब से देखा बल्कि उनके शहनाई वादन को करीब से महसूस किया। शहर के बड़े तबला वादक और पंडित किशन महाराज के शिष्य रहे पंडित शिव कुमार सिंह ने भी शहनाई वादन को करीब से देखा और सुना।

पटना में उस्ताद को सुनने को उमड़ती थी भीड़

दुर्गापूजा के मौके पर पटना शहर में कलाकारों की महफिल सजती थी। इसमें शास्त्रीय संगीत और नृत्य की उम्दा प्रस्तुति कलाकारों द्वारा होती थी। 1944 में गोविंद मित्र रोड से पटना में दशहरा संगीत समारोह का शुभारंभ हुआ। इसके बाद भारत माता मंडली, लंगरटोली, पटना जंक्शन दुर्गा पूजा समिति, मारूफगंज, नया टोला, खजांची रोड, मछुआ टोली, गर्दनीबाग, दानापुर, बोरिंग रोड आदि जगहों पर संगीत समारोह का आयोजन होता रहा, जहां सिर्फ शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को बुलाया जाता था। वरिष्ठ तबला वादक पंडित शिव कुमार सिंह की मानें तो पटना में खां साहब की अनगिनत प्रस्तुतियां हुईं। पटना में उनका अधिकतर एकल वादन हुआ।

लोगों की फरमाइश पर देते थे प्रस्तुति

शहर के वरिष्ठ तबला वादक अजय कुमार ठाकुर बताते हैं कि खां साहब लोगों की फरमाइश पर एक से बढ़कर एक गीतों पर शहनाई बजा लोगों का दिल जीतते थे। खां साहब बनारस की कजरी ‘कचौरी गली सुन कईल बलमू’ पर दिल खोल कर शहनाई बजाते थे। क्योंकि इस कजरी की धुन उन्हें अत्यंत प्रिय थी। तबला वादक अजय कुमार बताते हैं कि 90 के दशक में दुर्गापूजा पर खजांची रोड, गोविंद मित्र रोड, लंगर टोली में शास्त्रीय संगीत की महफिल खूब सजती थी। उस दौरान रामप्रसाद सौदागर मेले का आयोजन करते थे। इसमें देश के बड़े नामचीन कलाकारों ने पटना आकर प्रस्तुति दी।

संगीत, सुर और नमाज से था संबंध

उस्ताद का संगीत, सुर और नमाज से खास संबंध रहा। पंडित शिव कुमार सिंह कहते हैं कि खां साहब को गंगा का गौरव माना जाता है। वह हर दिन गंगा में स्नान करने करने के साथ राजेंद्र घाट पर बैठकर शहनाई का रियाज करते थे। खां साहब को गंगा और बनारस से खास लगाव रहा। गंगा और बनारस से इतना प्रेम था कि वे किसी भी हाल में बनारस को छोड़ना नहीं चाहते थे। खां साहब दिन में नमाज पढ़ते तो वही बाबा विश्वनाथ का दर्शन भी करते थे। खां साहब ने 21 अगस्त 2006 को बनारस में आखिरी सांस ली।

Posted By: Akshay Pandey

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