पटना [अरविंद शर्मा]। राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) को अब अखाड़ा बनने से बचाने की कोशिश हो रही है। लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में सफाए के बाद संगठन की हिफाजत पर जोर है। नीचे से ऊपर तक पार्टी में कई बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। बड़े उलटफेर के भी आसार हैं। इतनी बड़ी हार हुई है तो गाज का दायरा भी बड़ा होगा।

संगठन में वफादार मोहरों को मुस्तैद करने की हो रही तैयारी

तात्कालिक आक्रोश में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने पूरी कमेटी को भंग करने का फरमान सुना दिया था, किंतु हालात का हवाला देकर उन्हें समझा लिया गया। इसलिए अब विधानसभा चुनाव (Assembly Election) को देखते हुए शीर्ष नेतृत्व अपने अति सक्रिय और वफादार मोहरों को मुस्तैद करने की तैयारी में है। पांच जुलाई को आरजेडी का स्थापना दिवस है। अगले दिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है। उसके बाद संगठन के स्वरूप को बदलने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाएगी।

पहली बार लालू के बिना होगी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक

पांच जुलाई 1997 को आरजेडी की स्थापना के बाद अबकी पहली बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक लालू प्रसाद यादव के बिना होगी। कार्यकारिणी का एजेंडा अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन इसे लोकसभा चुनाव में पार्टी को हार के सदमे से उबारने की कोशिश मानी जा रही है।

विधानसभा चुनाव के पहले अखाड़े को सजा लेने की तैयारी

आरजेडी की वर्तमान कमेटी का कार्यकाल अगले साल नवंबर तक है। बीच में फेरबदल का मतलब  साफ है कि विधानसभा चुनाव के लिए पहलवान उतारने के पहले लालू अपने अखाड़े को अच्छे से सजा लेना चाहते हैं। कुछ उपचुनावों की बात छोड़ दें तो तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के नेतृत्व में पार्टी का यह पहला आम चुनाव था, जिसमें कई तरह के खट्टे अनुभव मिले हैं।

आंतरिक मोर्चे पर भी विरोध और बगावत की सूची लंबी

आंतरिक मोर्चे पर भी विरोध और बगावत की सूची लंबी है। पारिवारिक विवाद की अलग पटकथा है। लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक उत्तराधिकारी को सबसे निपटना है। हार से सबक लेना है और अज्ञातवास से लौटकर नई ऊर्जा के साथ फिर खड़ा होने का प्रयास करना है।

प्रदेश कमेटी हो सकती है छोटी, अधिकांश की होगी छुट्टी

लोकसभा चुनाव के पहले पार्टी संविधान के विरुद्ध पदाधिकारियों की नियुक्ति का भी कोई सकारात्मक असर नहीं देखा गया। लालू परिवार के अंदर-बाहर के दबाव में प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र पूर्वे ने दर्जनों की संख्या में प्रदेश महासचिव नियुक्त कर दिए थे। मकसद था चुनाव में फायदा लेना, लेकिन सफलता मिली नहीं। अब अधिकतर की छुट्टी होगी। इसी तरह करीब दर्जन भर जिलाध्यक्षों की भूमिका भी चुनाव के दौरान संदिग्ध रही है। आरजेडी को उनसे भी निजात पाना है। उनकी जगह विश्वस्तों को बिठाया जाएगा।

बूथ स्‍तर पर कमजोर आरजेडी, बूथ प्रबंधन बड़ी चुनौती

पराजय के कारणों की पड़ताल के लिए वरिष्ठ नेता जगदानंद सिंह के नेतृत्व में बनी आरजेडी की तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट में बूथ स्तर पर संगठन की कमजोरी को भी प्रमुख माना गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की तुलना में आरजेडी का बूथ प्रबंधन बेहतर नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान तो कई बूथों पर पार्टी की मौजूदगी तक नहीं थी। आरजेडी की कोशिश सक्रिय सदस्यों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ बूथ स्तर पर बीजेपी से मुकाबले की भी है, ताकि जरूरत पर समर्थकों को बूथों तक पहुंचाया जा सके।

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Posted By: Amit Alok