पटना [अरविंद शर्मा]। कीर्ति झा के भाजपा से आजाद (निलंबित) होने के साथ ही दरभंगा संसदीय क्षेत्र का दरवाजा पूरी तरह खुल गया है। चार साल पहले जिन्हें इस क्षेत्र का प्रतिनिधि चुना गया था, उनका पार्टी से लगाव खत्म होते ही मतदाता भी मुक्त हो गए हैं। अगली बार के महारथियों को अपनी कसौटी पर परख रहे हैं। दावेदार भी दस्तक देने लगे हैं। किसी को भाजपा-जदयू से तो किसी को कांग्रेस-राजद से टिकट की दरकार है।

मतदाताओं का मिजाज राजशाही

दरभंगा के मतदाताओं का मिजाज कुछ-कुछ राजशाही है। जो भा गया, उसे बादशाह बना दिया। यही कारण है कि अरसे तक यहां के मतदाता कांग्रेेस के साथ खड़े रहे और जब उखड़ गए तो दोबारा वापस नहीं आने दिया। दरभंगा में कांग्रेस के लिए 1980 का साल आखिरी था। उसके बाद लोकदल, जनता दल, भाजपा, राजद सबको आजमाया, किंतु कांग्रेस को नहीं अपनाया।

कीर्ति के बूते मैदान में उतरेगी कांग्रेस!

कीर्ति झा के बूते कांग्रेस अबकी दरभंगा को लेकर सपने सजा रही है। कीर्ति ने संकेत दिया है कि वह हाथ के साथ ही मैदान में उतरेंगे। उनकी पत्नी पूनम झा पहले से ही रास्ता बना रही हैं।

कांग्रेस के टिकट के लिए कीर्ति की दावेदारी से राजद के अली अशरफ फातमी बुरी तरह फंसे दिख रहे हैं, क्योंकि महागठबंधन में किसी एक को ही मौका मिलेगा। राजद को या कांग्रेस को। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि कीर्ति या फातमी कोई एक ही प्रत्याशी होगा। वैसे भी राजद ने फातमी के पुत्र फराज को केवटी से विधायक बनाकर बहुत कुछ पहले ही स्पष्ट कर दिया है।

राजग को चाहिए सशक्‍त उम्‍मीदवार

अब बात भाजपा-जदयू की। कीर्ति को आजाद करने के बाद गठबंधन को सशक्त उम्मीदवार चाहिए। दावेदारी कई कर रहे हैं। बेनीपुर के पूर्व और वर्तमान विधायक की सक्रियता बढ़ गई है। पूर्व वाले भाजपा के गोपालजी ठाकुर हैं और वर्तमान वाले जदयू के सुनील चौधरी।

किंतु सबपर भारी जदयू के संजय कुमार झा हैं। पटना से दिल्ली तक दोनों दरबारों से सीधा संपर्क रखने वाले संजय राजग के लिए कीर्ति का विकल्प बन सकते हैं। 2014 की प्रचंड मोदी लहर में भी संजय ने जदयू प्रत्याशी के रूप में एक लाख से अधिक वोट लाकर अगली बार की दावेदारी पक्की कर ली थी। संजय की उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है कि जदयू की उपस्थिति दरभंगा में इसके पहले थी ही नहीं। उन्होंने जदयू के लिए पहली बार संघर्ष किया था।

अरुण जेटली के करीबी माने जाने वाले संजय पहले भाजपा कोटे से विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं। क्षेत्र में काम के लिए संजय का नाम है। हवाई अड्डे से लेकर रसियारी में ब्रिज बनवाने तक का श्रेय उन्हीं को जाता है।

दरभंगा में अबकी ऐसी लड़ाई का संयोग बन रहा है, जो पहले कभी नहीं था।

कीर्ति से होगा राजग का मुकाबला

राजग की तरफ से जो भी मैदान में आएगा, उसे कीर्ति झा से तो मुकाबला करना ही होगा। केंद्र कर पीएम मोदी सरकार से बेहतर तालमेल नहीं रहने के कारण कीर्ति पार्टी से निलंबित हैं। वे राजग उम्‍मीदवार के लिए सिरदर्द बनेंगे, यह तय है।

साथ ही राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी, ललित यादव और भोला यादव जैसे विधायकों से भी पार पाना होगा। जदयू कोटे के मंत्री मदन सहनी और भाजपा के संजय सरावगी की भी परीक्षा होनी है। बहरहाल, 1990 से फातमी और 1998 से कीर्ति झा को बारी-बारी से आजमाते आ रहे दरभंगा के सामने फिर मौका आने वाला है।

अबतक सांसद

पहले संसदीय चुनाव में नारायण दास, सत्यनारायण सिन्हा, विनोदानंद झा तथा उनके निधन के बाद उपचुनाव में ललित नारायण मिश्र एमपी चुने गए थे। 1977 की लहर प्रो. सुरंद्र झा सुमन सांसद बने। इसके बाद हरिनाथ मिश्र, विजय कुमार मिश्र, शकीलुर्रहमान, अली अशरफ फातमी और कीर्ति आजाद प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। आजादी की लड़ाई में भी दरभंगा का बड़ा योगदान था। रामनंदन मिश्र, सूर्यनारायण सिंह, अनिरुद्ध सिंह, हरिनाथ मिश्र, रामसेवक यादव एवं लक्षमण झा जैसे नेता अति सक्रिय रहे थे।

2014 के महारथी और वोट

कीर्ति आजाद : भाजपा : 314949

अशरफ फातमी : राजद : 279906

संजय कुमार झा : जदयू : 104494

केदार केशव : शिवसेना : 25277

विधानसभा क्षेत्र

दरभंगा (भाजपा), गौड़ाबौराम (जदयू), बेनीपुर (जदयू), अलीनगर (राजद), दरभंगा ग्रामीण (राजद), बहादुरपुर (राजद)

 

Posted By: Amit Alok

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