'तोरा बिना नीक नाही लागे सांवरिया...', प्रेमी-प्रेमिका के लिए नहीं है बिहार का ये लोकगीत
Bihar Folk Song: यह लेख बिहार में पितृपक्ष के दौरान गाए जाने वाले 'निर्गुण' भजनों के आध्यात्मिक महत्व को बताता ...और पढ़ें

बिहार के गांवों में निर्गुण का है विशेष स्थान। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
निर्गुण भजन आत्मा और परमात्मा के गहरे संबंध बताते हैं।
पितृपक्ष में ये भजन पूर्वजों की शांति के लिए गाए जाते हैं।
लोकगायिका चंदन तिवारी निर्गुण के आध्यात्मिक अर्थ समझाती हैं।
डिजिटल डेस्क, पटना। Bihar Lokgeet: 'तोरा बिना नीक नाही लागे रे सांवरिया, अटरिया सून कर गइले ना...। जब किसी शांत शाम को यह सुर निकलते हैं, तो पहली नजर में यह किसी प्रेयसी का प्रियतम के लिए विलाप लग सकता है।
लेकिन बिहार की सांस्कृतिक माटी और अध्यात्म को समझने वाले जानते हैं कि यह तड़प किसी हाड़-मांस के इंसान के लिए नहीं है।
यह भोजपुरी का वह कालजयी 'निर्गुण' भजन है, जहां 'सांवरिया' स्वयं निराकार परमात्मा है और 'अटरिया' (महल) एक मानव शरीर है।
पितृपक्ष में निर्गुण भजनों की गूंज

(भरत शर्मा व्यास।)
चर्चित लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं कि जैसे ही प्राण-तत्व (सांवरिया) इस देह रूपी अटरिया को छोड़कर जाता है, सब कुछ सूना हो जाता है।
26 सितंबर से शुरू हो रहे पितृपक्ष में, बिहार की फिजाओं में इन निर्गुण भजनों की गूंज अचानक गहरी हो गई है। मोक्ष की भूमि गया जी में जहां लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण कर रहे हैं।
वहीं, ग्रामीण अंचलों में भरत शर्मा व्यास, मदन राय समेत अन्य गायकों के गाए निर्गुण जीवन की क्षणभंगुरता (जो आज है, कल समाप्त हो जाएगा) का अहसास करा रहे हैं।
आमतौर पर गीतों में 'सांवरिया' शब्द आते ही मन में राधा-कृष्ण के प्रेम या लोक-गीतों के पारंपरिक शृंगार रस की छवि उभरती है।

(लोकगायिका चंदन तिवारी।)
आत्मा को प्रेयसी और ईश्वर को माना प्रियतम
परंतु, निर्गुण भजनों में आकर यह शब्द पूरी तरह आध्यात्मिक हो जाता है। कबीर के दर्शन से उपजी बिहार की इस निर्गुण परंपरा में जीव (आत्मा) को 'दुल्हिन या 'प्रेयसी' और ईश्वर को 'दूल्हा' या 'प्रियतम' माना गया है।
पितृपक्ष के दौरान जब लोग अपने उन पूर्वजों को याद करते हैं जो इस संसार को छोड़ चुके हैं, तब ये भजन एक मरहम की तरह काम करते हैं।
यह याद दिलाते हैं कि जिसे हम 'मृत्यु' कहकर शोक मना रहे हैं, वह दरअसल आत्मा का अपनी अंतिम मंजिल (परमात्मा) की ओर प्रस्थान है। पितृपक्ष में क्यों प्रासंगिक हो जाते हैं ये भजन?
बिहार के ग्रामीण इलाकों में पितृपक्ष की रातों में निर्गुण सुनने की पुरानी परंपरा है। इस दौरान कुछ प्रमुख भजनों की मांग डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और गांवों के चौपालों पर बेहद बढ़ जाती है।
आत्मा और शरीर का क्या है संबंध?
कवन नगरिया जइबू ए हंस... जहां 'हंस' प्रतीक है उस पवित्र आत्मा का, जो पिंजरा (शरीर) छोड़ उड़ने को तैयार है। 'माटी के पुतलिया ई माटी में मिल जाई...' जो इंसानी अहंकार को झकझोर कर रख देता है।
यह शोक को वैराग्य और भक्ति में बदल देता है। यह संगीत हमें सिखाता है कि यह जीवन केवल एक पड़ाव है, असली घर तो कहीं और है।
लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं कि निर्गुण के शब्द ईश्वर से जोड़ते हैं। यह जीवन की सत्यता को दर्शाते हैं। वे कहती हैं कि कबीर दास के कई निर्गुण उन्हें पसंद हैं। कौने ठगवा नगरिया, एक दिन जयबू अपना पियबा के घर जैसे निर्गुण वे बड़े प्रेम से गाती हैं।
