पटना [आशीष शुक्ल]। ये कहानी लगती फिल्मी है, मगर है सच। एक साधारण परिवार की महिला का सपना जिसे उसकी तीन बेटियों ने पूरा कर दिखाया। ये कहानी है उस महिला वैजयंती की जिसका बचपन से सपना था कि वह अपने भाइयों की तरह वर्दी पहने, मगर आर्थिक मजबूरियों के कारण 12वीं से आगे की पढ़ाई नहीं कर सकीं। शादी हुई और समय बीतता गया। सोचा, बेटे को वर्दी में देखकर अपना सपना जी लेंगी, मगर यह भी नहीं हो सका।

भगवान ने वैजयंती को चार बेटियां ही दीं, लेकिन वैजयंती ने बेटियों को बेटों की तरह पाला। पढ़ाया-लिखाया और अपने साथ दौड़ाया भी। परीक्षा दिलवाने कंधे पर टाइपराइटर ढोकर जाती रहीं। एक मां की मेहनत का नतीजा अब सबके सामने है।

वैजयंती की तीनों बेटियों ने कर दिखाया कमाल

वैजयंती की बड़ी बेटी रवि रंजना पटना में महिला थाना प्रभारी है, दूसरी बेटी रवि किरण गुजरात सीआइएसएफ में इंस्पेक्टर तो तीसरी रवि रोशनी आरपीएफ में सब-इंस्पेक्टर है। वैजयंती जब अपनी तीनों बेटियों को वर्दी में देखती है, तो उसमें खुद को महसूस करती है। चौथी बेटी रवि रेणुका अभी पढ़ाई कर रही है। उसका सपना भी पुलिस अफसर बनने का है ।

वैजयंती ने अपनी बेटियों को कभी बेटों से कम नहीं समझा

55 वर्षीय वैजयंती कहती हैं कि न मैंने कभी बेटियों को बेटों से कम समझा और न बेटियों न यह महसूस होने दिया। चारों बेटियों की 10वीं तक की पढ़ाई कोइलवर में ही हुई। वहां सुबह-शाम जब फुर्सत मिलती, बेटियों को अपने साथ हाई स्कूल के ग्राउंड में दौड़ाने के लिए ले जाती।

समाज के लोग देते थे ताना, कभी ध्यान नहीं दिया

शुरुआती दिनों में बहनों को दौड़ लगाते देख आसपास के लोग ताना भी मारते थे, लेकिन हमने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। आज वही लोग मेरी बेटियों का उदाहरण देकर अपने बच्चों को मैदान में दौड़ाने लाते हैं। 2009 में सबसे पहले बड़ी बेटी रवि रंजना को सब इंस्पेक्टर की भर्ती में सफलता मिली। इसके बाद दो अन्य बेटियां भी वर्दी पाने में कामयाब हो गईं।

बहनें एक दूसरे को बांधती हैं राखी

 बात 2007 की है। रांची में टाइपिस्ट के पद के लिए वेकैंसी निकली थी। रवि रंजना को रांची परीक्षा देने जाना था। रवि रंजना के साथ पटना से रांची तक मां वैजयंती कंधे पर टाइपराइटर मशीन टांगकर ले गई। रवि रंजना कहती हैं कि हम हर साल राखी मनाते हैं। भाई को न होने पर हम चारों बहनें आपस में ही एक दूसरे को राखी बांधते हैं।

बोलते थे पापा, रोते हुए कभी मत आना घर

महिला थाना प्रभारी रवि रंजना कहती हैं कि मेरे पिता रवि शंकर होम्योपैथ के डॉक्टर हैं। उन्होंने भी हमें हर तरह से सपोर्ट किया। रवि रंजना जब पहली बार घर से अकेले कोईलवर से बिहटा कॉलेज जाने के लिए निकलीं तो पिता ने दो टूक कहा कि आत्मनिर्भर बनना सीखो। तुम खुद को सशक्त कर सकती हो। घर पर कभी रोते हुए मत आना।

रवि रंजना कहती हैं कि पिताजी की आमदनी ज्यादा नहीं थी। चारों बहनों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए मां वैजयंती घर में ही सिलाई-कढ़ाई करती थी। मां को सिलाई करते देख चारों बहनें भी अपना कपड़ा खुद सिलने लगीं। इससे पैसे की बचत भी होती थी।

Posted By: Kajal Kumari

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप