पटना [आशीष शुक्ल]। गांधी सेतु के भार को कम करने और बिहारवासियों को राहत देने के लिए जेपी सेतु दिन की रोशनी में भले ही दिलकश लगता है, लेकिन रात होते ही यह किसी भुतहा जगह से कम नहीं लगता। दूर तक पसरा अंधेरा और पुल का सन्नाटा पूरे सफर के दौरान डराता है। पुल पर न तो कोई सुरक्षा इंतजाम है और न पुलिस का पहरा।

दोनों ओर के संपर्क पथ भी अंधेरे के आगोश में हैं। उसपर बेतरतीब ढंग से बने डिवाइडर और हिचकोले वाली सड़क जैसे हादसे के लिए ही बनाए गए हैं। दो टूक ये कि रात में इस पुल से सफर न ही किया जाए तो बेहतर। 

रात 2:00 बजे

दीघा ऑटो स्टैंड पर चार-पांच ऑटो लगे हैं। आधा दर्जन युवक आसपास घूम रहे हैं। पुलिस तो दूर एक होमगार्ड का जवान भी नहीं दिख रहा। ऑटो स्टैंड से आगे सेतु की ओर बढऩे पर पूरी सड़क पर अंधेरा पसरा है। सड़क घुमावदार है और डिवाइडर खतरनाक। मुश्किल से दो सौ मीटर आगे बढ़ते ही अचानक मोड़ आता है।

मोड़ पर एक ही लेन को दो हिस्सों में बांटने के लिए खतरनाक डिवाइडर बने हैं। अगर वाहन की स्पीड गलती से भी तेज हुई तो खाई में गिरना तय। पुल के पाया संख्या एक पर चढ़ते ही पुल पर टिमटिमाती रोशनी दिखती है। मन में बस यही ख्याल आता है कि पीछे से कोई और वाहन भी साथ हो, पर ऐसा होता नहीं।  

रात 2:20 बजे

पाया संख्या दस के आगे टिमटिमाती रोशनी भी साथ छोड़ देती है। अब आगे सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा। अंधेरे के डर से ऐसा लगता है, जैसे तेजी से गाड़ी भगाकर जल्दी पुल पार कर ली जाए। अंधेरे पुल पर ऐसा करना, हादसे को न्योता देना ही है। पाया संख्या 10 तक का इलाका पटना पुलिस के दायरे में है। आगे की सुरक्षा का जिम्मा सोनपुर पुलिस का है, मगर पुल पर दोनों में से कोई भी नहीं दिखती। 

बीच पुल पर अंधेरे में कार खड़ी है। हमारी गाड़ी पास आते देख ड्राइवर लाठी लेकर बाहर निकलता है। पूछने पर पता चला कि गाड़ी खराब हो गई है। ड्राइवर बुरी तरह सहमा हुआ है। कार में बैठे युवक मदद के लिए किसी को फोन करते दिखे। ड्राइवर बोलता है, बुरी तरह फंस गए हैं।

एक तो पुल पर गाडिय़ां नहीं चल रहीं। कोई गाड़ी दिखती भी है, तो डर लगता है कि चोर-लुटेरे न हों। हम आगे बढ़ते हैं। सेतु का सफर अब खत्म होने को है। सोनुपर की तरफ पुल के अंतिम छोर पर रोशनी दिखती है। पास से गुजरने पर पता चलता कि कुछ मजदूर मररम्मत कार्य में जुटे हैं। पुलिस वाले यहां भी नहीं दिखते। 

रात 2:35 बजे 

सेतु से उतरने के बाद सड़क के ओर दोनों ओर रेडियम लाइट टिमटिमाती दिखी। लिंक रोड आगे दो रास्तों में बंटा है। दोनों रास्ते किधर जाते हैं, इसकी जानकारी देने के लिए साइन बोर्ड तक नहीं है। यहां से हाजीपुर जाने वाली सड़क ठीक है। अब बारी वापस पटना लौटने की है। 

रात 3:00 बजे

 सोनपुर से पटना लौटने के क्रम में लिंक रोड पर तीन बाइक पर बैठे छह लड़के मोड़ दिखाई देते हैं। हमारी गाड़ी के थोड़ा आगे बढ़ते ही तीनों बाइक सवार तेज रफ्तार में ओवरटेक कर लहरिया काटते पटना की तरफ निकल जाते हैं। लौटने के क्रम में सेतु पर गाडिय़ों की आवाजाही थोड़ी बढ़ गई थी। अब इक्का-दुक्का गाडिय़ां मिनट दो मिनट पर गुजरती दिखतीं। हालांकि पुलिस अब भी नदारद थी। 

हादसा हुआ तो पता भी नहीं चलेगा  

जेपी सेतु पर रात के सफर के दौरान अगर कोई हादसा हो गया तो मदद की कोई भी उम्मीद बेमानी लगती है। पुल के दोनों छोर पर भी मदद के चेक पोस्ट नहीं है। पुलिस तो दिखती भी नहीं। 

इसलिए रात में खतरनाक है सेतु का सफर

- पुल पर पसरा अंधेरा

- कोई चेकपोस्ट नहीं

- सीसी कैमरे तक नहीं

- तीखे मोड़ पर बने डिवाइडर

- गाडिय़ों की कम आवाजाही

- बाइकर्स का लहरिया कट

- गश्ती पुलिस का नदारद होना

- डिवाइडर पर रेडियम लाइट नहीं

- लिंक रोड पर साइन बोर्ड का अभाव

- खराब गाड़ी हटाने के लिए क्रेन नहीं

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37 पाये हैं कुल जेपी सेतु में 

4.5 किमी लंबा है जेपी सेतु

10 नंबर पाये तक सुरक्षा की जिम्मेवारी पटना पुलिस की, उसके बाद की सुरक्षा सोनपुर पुलिस के हवाले

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Posted By: Ravi Ranjan

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