पटना [अरुण अशेष]। केंद्रीय कैबिनेट में जदयू की सांकेतिक भागीदारी से इनकार के दिन से ही बिहार एनडीए में तकरार की उम्मीद में बैठे लोगों को उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के एक वाक्य ने निराश कर दिया है-राज्य विधानसभा का अगला चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। पिछले एक सप्ताह की कुछ राजनीतिक घटनाएं इस धारणा को बल दे रही थीं कि भाजपा और जदयू के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। दोनों दल अलग-अलग विधानसभा चुनाव की तैयारियां कर रहे हैं। इन दलों के मंझौले दर्जे के नेता इस संभावना को हवा दे रहे थे। 

गंभीर नेतृत्‍व को पता है गठबंधन तोड़ने का मतलब

भाजपा और जदयू का शीर्ष नेतृत्व भले ही साझे में चुनाव लड़कर जीत की गारंटी चाहता हो, लेकिन इससे उन्हें राहत नहीं मिलती जो अधिक सीटों पर चुनाव लडऩे की हालत में अपने लिए टिकट की आस में पांच साल तक इंतजार करते हैं। गठबंधन में लडऩे वाली सीटों की तादाद कम हो जाती है। अधिक लोग उम्मीदवार नहीं बन पाते। संयोग से ऐसे दावेदार दोनों दलों में हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत से वाकिफ गंंभीर नेतृत्व किसी भी हालत में गठबंधन तोडऩा नहीं चाहता है। 

धारा 370 का मामला भी कोई नया नहीं है 

फिलहाल, बिहार एनडीए में यही चल रहा है। जदयू ने केंद्रीय कैबिनेट में महज एक सीट मिलने के कारण शामिल होने से इनकार कर दिया। इसे जदयू की घोर नाराजगी के रूप में प्रचारित किया गया। हकीकत है कि पार्टी ने यह फैसला अंदरूनी कलह से बचने के लिए किया। पांच-छह दावेदारों में से किसी एक को मंत्री बना देने से जदयू के बाकी सांसद नाराज हो सकते थे। धारा 370 को समाप्त करने के जदयू के विरोध को भी टूट की संभावना से जोड़ दिया जा रहा है, जबकि 1998 में ही एनडीए में शामिल होने के वक्त तत्कालीन समता पार्टी और भाजपा में सहमति बन गई थी कि मतभेद वाले मुद्दे पर वे अलग रहेंगे। इसके बावजूद 2014 के लोकसभा और 2015 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो दोनों दल बिहार में साझे में चुनाव लड़ते रहे हैं। कामयाब भी रहे।

सलट गया आरएसएस के खिलाफ खुफियागिरी का मामला

ताजा मामला आरएसएस की खुफियागिरी का है। विशेष शाखा के एक एसपी ने 28 मई को जिलों के एसपी को पत्र लिखकर कहा था कि वे आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के पदधारकों का नाम, पता, कारोबार और टेलीफोन नम्बर मुख्यालय को भेजें। इसके लीक होते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने अफसरों को फटकार लगाई और सफाई देने को कहा। पुलिस के एडीजी जीएस गंगवार ने जल्दबाजी में प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर कहा कि पत्र जारी करने वाले अफसर के खिलाफ जांच होगी। उन्होंने बिना पुलिस मुख्यालय की जानकारी में पत्र जारी किया था। गंगवार की सफाई के बाद भाजपा के दो नेताओं की प्रतिक्रिया आई। एक केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और दूसरे विधान परिषद सदस्य सच्चिदानंद राय। जदयू अक्सर इन दोनों की टिप्पणी की नोटिस नहीं लेता है।

गिरिराज और सच्चिदानंद की सक्रियता से ने जदयू नाराज

लेकिन, पत्र प्रकरण के बाद गिरिराज सिंह और सच्चिदानंद राय की सक्रियता ने जदयू को नाराज किया। राज्यसभा के पूर्व सदस्य पवन कुमार वर्मा ने तल्खी दिखाई। वे यहां तक बोल गए कि भाजपा समय रहते तय कर ले कि साथ रहकर विधानसभा चुनाव लडऩा चाहती है या नहीं। हालात ऐसे बने कि दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में यह बात फैल गई कि गठबंधन में कोई गंभीर मतभेद चल रहा है। इस बीच राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुलाकात तकरार की संभावना को आधार दे रहा था। ऐन मौके पर सुशील मोदी ने नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लडऩे की घोषणा कर तमाम आशंकाओं और ऊहापोह पर विराम लगा दिया। इससे पहले प्रदेश नेतृत्व ने सच्चिदानंद राय से जवाब तलब कर बता दिया कि गठबंधन को क्षति पहुंचाने वाले नेता उसे नहीं चाहिए। 

Posted By: Rajesh Thakur

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