मानहानि नोटिस पर सुधाकर सिंह की स्पीकर से गुहार, IPS कुंदन कृष्णन के खिलाफ जांच और कार्रवाई की मांग
राजद सांसद सुधाकर सिंह ने आईपीएस कुंदन कृष्णन द्वारा भेजे गए मानहानि नोटिस पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से हस्तक्षेप ...और पढ़ें

बक्सर सांसद सुधाकर सिंह
HighLights
सांसद सुधाकर सिंह ने स्पीकर से हस्तक्षेप मांगा।
IPS कुंदन कृष्णन के मानहानि नोटिस का मामला।
भोजपुर संदिग्ध मौत पर सवाल उठाने से जुड़ा।
जागरण संवाददाता, पटना। भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी की संदिग्ध मौत और कथित फर्जी मुठभेड़ का मामला अब संसदीय स्तर पर पहुंच गया है। इस प्रकरण को लेकर सवाल उठाने वाले राजद के बक्सर सांसद सुधाकर सिंह ने बिहार के वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से भेजे गए मानहानि के कानूनी नोटिस पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से हस्तक्षेप की मांग की है।
सांसद ने पत्र लिखकर पूरे मामले की जांच कराने और प्रथमदृष्टया आधार मिलने पर इसे संसद की विशेषाधिकार समिति के पास भेजने का आग्रह किया है।
पांच करोड़ के मानहानि वाद की चेतावनी का दावा
सुधाकर सिंह के मुताबिक, कुंदन कृष्णन ने अपने निजी अधिवक्ता के माध्यम से उन्हें कानूनी नोटिस भेजा है। सांसद का कहना है कि नोटिस में सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के साथ पांच करोड़ रुपये के मानहानि वाद और आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
सुधाकर सिंह ने इसे अपने संसदीय दायित्वों के निर्वहन से जोड़ते हुए लोकसभा अध्यक्ष से मामले का संज्ञान लेने का अनुरोध किया है।
संदिग्ध मौत की जांच और पुलिस की भूमिका पर सवाल
विवाद की जड़ भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी की संदिग्ध मौत और कथित फर्जी मुठभेड़ का मामला है। सुधाकर सिंह ने पत्र में दावा किया है कि संबंधित पुलिसकर्मियों का निलंबन हुआ है और मृतक की मां की शिकायत पर प्राथमिकी भी दर्ज की गई है।
उनके अनुसार, राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच के लिए समिति गठित की है, लेकिन जांच के निष्कर्ष अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं।
तत्कालीन पुलिस नेतृत्व की भूमिका की जांच की मांग
सांसद ने कहा है कि जांच का दायरा केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके मुताबिक, घटना के समय कुंदन कृष्णन बिहार एसटीएफ के महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे।
ऐसे में आदेश देने की प्रक्रिया, अधिकारियों के बीच संवाद, पुलिस मुख्यालय को मिली जानकारी और तत्कालीन नेतृत्व की भूमिका की भी निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए। हालांकि, इन आरोपों और सवालों पर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
‘जनप्रतिनिधि के सवालों पर दबाव बनाने की कोशिश?’
सुधाकर सिंह ने आशंका जताई है कि मानहानि का नोटिस उन्हें इस मामले को संसद में उठाने से रोकने का प्रयास हो सकता है। उनका तर्क है कि जनप्रतिनिधियों को प्रशासनिक कार्रवाई और संभावित सत्ता के दुरुपयोग पर सवाल उठाने का अधिकार है।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 105 का हवाला देते हुए संसदीय विशेषाधिकारों और सदन में स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने के अधिकार का मुद्दा उठाया है।
नोटिस भेजने की हैसियत और सरकारी अनुमति पर सवाल
सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष से यह स्पष्ट कराने की मांग की है कि कुंदन कृष्णन ने नोटिस किस हैसियत से भेजा और क्या इसके लिए बिहार या केंद्र सरकार से किसी प्रकार की अनुमति ली गई थी।
उन्होंने अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के नियम 17 का भी उल्लेख किया है। इसके साथ ही निजी विधि फर्म की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या वह केवल अधिकारी का निजी पक्ष रख रही थी या उसे बिहार सरकार की ओर से पक्ष रखने का भी अधिकार दिया गया था।
स्पीकर के सामने रखीं पांच प्रमुख मांगें
सुधाकर सिंह ने लोकसभा अध्यक्ष से पूरे मामले की जांच कराने, पर्याप्त आधार मिलने पर इसे विशेषाधिकार समिति को भेजने और नोटिस जारी करने के लिए ली गई अनुमति की जानकारी उपलब्ध कराने का आग्रह किया है।
उन्होंने निजी विधि फर्म को सरकारी पक्ष रखने की अनुमति से जुड़े आदेश और उसके दायरे को स्पष्ट करने की मांग भी की है।
इसके अलावा, सांसद ने न्यायिक जांच की मौजूदा स्थिति और उसके निष्कर्षों की जानकारी मांगी है। उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि जनप्रतिनिधियों के संसदीय दायित्वों के निर्वहन में किसी तरह का दबाव या प्रतिशोध सामने आने पर सदन की गरिमा और सदस्यों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उचित कदम उठाए जाएं। अब इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित पक्षों की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी।
