पटना [अरविंद शर्मा]। लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद से राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) दुविधा की स्थिति में है। लेकिन उसे इससे उबरकर  इसी हफ्ते अपनी राजनीतिक लाइन तय करनी पड़ेगी। अगले कदम का रुख स्पष्ट करना पड़ेगा। लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) व जनता दल यूनाइटेड (JDU) की संयुक्त ताकत के खिलाफ लड़कर बुरी तरह हार चुके आरजेडी नेतृत्व के पास अब पर्दे में रहने का समय नहीं है। छह जुलाई को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है। उसमें राजनीतिक प्रस्ताव पास कराना है। जाहिर है, इसके पहले उसे आगे की राजनीति तय करना होगा।

दुविधा में फंसे आरजेडी के नेता-कार्यकर्ता

विधानसभा चुनाव (Assembly Election) आने वाला है किंतु नेतृत्व की उदासीनता के कारण पार्टी में दुविधा की स्थिति है। कार्यकर्ता ही नहीं, वरिष्ठ नेता भी समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें क्या और कितना बोलना है। आरजेडी के हाल में हुए कुछ कार्यक्रमों एवं धरना-प्रदर्शनों पर गौर किया जाए तो सबकुछ साफ हो जाता है। पार्टी प्रवक्ताओं की जबसे छुट्टी कर दी गई है तभी से प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र पूर्वे समेत कई बड़े नेताओं ने अपने मुंह पर ताला लगा रखा है। बोलने से बच रहे हैं। जरूरी हुआ तो नाप-तौल के बोल रहे हैं।

ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती ऐसी स्थिति

लेकिन ऐसी स्थिति ज्यादा दिनों तक बरकरार नहीं रह सकती है, क्योंकि 28 जून से बिहार विधानमंडल का बजट सत्र (Budget Session) शुरू होने वाला है। सदन में तो मुंह खोलना ही पड़ेगा। विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करना ही होगा। साथ ही महागठबंधन (Grand Alliance) की एकजुटता को भी परीक्षा के दौर से गुजरना होगा।

सत्र शुरू होने से पहले आरजेडी विधानमंडल दल की बैठक करने की औपचारिकता भी पूरी करनी है। पहले 28 जून की तिथि तय कर दी गई थी। लेकिन लोकसभा चुनाव में हार के बाद से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) गायब हैं। इसलिए फिलहाल बैठक को टाल दिया गया है।

अनिश्चितताओं के बीच असमंजस के हालात

इतनी तरह की अनिश्चितताओं के बीच आरजेडी में असमंजस के हालात हैं। बात-बात पर बीजेपी-जेडीयू पर अपने तीखे बयानों से हमला करने वाले आरजेडी के प्रतिक्रियावादी नेताओं को नेता प्रतिपक्ष का इंतजार है, जो 29 मई से ही अदृश्य हैं। कहां हैं किसी को नहीं पता। सोशल मीडिया से भी परहेज कर रखा है।

कल बैठक बैठेंगे आरजेडी के वरिष्ठ नेता

तेजस्वी यादव के अज्ञातवास से उपजे हालात और आगे की स्थिति पर विमर्श करने के लिए राजद के वरिष्ठ नेता 26 जून को एक साथ बैठेंगे। कार्यकारिणी की तैयारी का बहाना है, किंतु मुख्य रूप से बात होगी ऊपर के संकेत (डायरेक्शन) पर। तेजस्वी हैं नहीं। राबड़ी देवी (Rabri Devi) कुछ बता नहीं रही हैं। ऐसे में पार्टी की सियासी लाइन क्या होनी चाहिए? दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता क्या करें? क्या न करें। राजनीतिक प्रस्ताव का भावार्थ क्या होना चाहिए? समय रहते अगर संशय से नहीं उबर पाए तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को टालना भी पड़ सकता है। अगले महीने से पार्टी का सदस्यता अभियान भी शुरू करना है।

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Posted By: Amit Alok