बांका, राहुल कुमार। Republic Day Celebration Special: स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार के बांका शहर के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को काफी परेशान किया था। 1942 के आंदोलन में बांका के सेनानियों का खौफ ब्रिटिश संसद तक गूंजने लगा। उन्हें रोकने के लिए अंग्रेज सेना ने निर्दयता की सारी हदें पार कर दी थीं। बिहार के कचनसा गांव के चार भाइयों की वीरता की गाथा को बांका अब भी गर्व से गाता है। वे थे जागो शाही, पागो शाही, रामेश्वर शाही और लक्खी शाही जिनकी संगठन क्षमता से पूरे गांव में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी का बिगुल बजने लगा।

दो हाथियों की मदद से ढहवा दिए चारों भाइयों के घर

इन चार भाइयों की लोकप्रियता का अंदाजा लगने पर 1942 में गांव में अंग्रेजों ने सेना भेजी। सेना के साथ पहुंचे दो हाथियों की मदद से गांव के कच्चे घरों को ढहवा दिया गया। इस घटना की चश्मदीद पागो शाही की पत्नी सुंदरी देवी (100 वर्षीया) की बूढ़ी आंखों में वह खौफनाक मंजर आज भी जिंदा है। उनके अनुसार, 1942 के आंदोलन में परशुराम सिंह के नेतृत्व में जमदाहा में क्रांतिकारियों ने भारी उत्पात कर विरोध मचाया था। कई जगहों पर आगजनी की गई थी।

मतवाला पहाड़ पर रहते थे चारों भाई

इसके कुछ दिनों के बाद अंग्रेज फौजी दो हाथी लेकर गांव आए और सभी घरों को ढहवा दिया। किसी घर में खाने और दैनिक उपयोग की कोई चीज नहीं रहने दी थी। पूरा गांव एक तरह से बर्बाद हो गया। परशळ्राम दल के संस्थापक परशुरम सिंह के अनुयायी चारों भाई गांव में नहीं थे। उनका ठिकाना तो मतवाला पहाड़ था। इसके बाद चारों भाइयों की तलाश में गोरी फौज गांव आने लगी। गांव के लोगों को प्रताड़ित किया गया कि वे चारों भाइयों के बारे में अंग्रेजों को कोई सुराग दे दें।

मुखबिर की सूचना पर हुई गिरफ्तारी

सुंदरी के अनुसार, एक दिन उनके जेठ जागो शाही, पति पागो शाही और देवर लक्खी शाही कई क्रांतिकारियों के साथ पास के गांव भुड़कुड़िया में बैठक कर रहे थे। इसी गांव के एक मुखबिर की खबर पर अंग्रेजों ने 31 अक्टूबर को तीनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया। जागो शाही और लक्खी शाही को 1945 में भागलपुर केंद्रीय कारागार में फांसी दे दी गई। बड़े भाई की अंतिम इच्छा छोटे भाई पागो शाही से मिलने की थी। मिलने के दौरान पागो शाही खूब रोने लगे। इस पर बड़े भाई ने भरोसा दिया कि उन्हें फांसी भले हो रही है, मगर वे अपना सपना पूरा करने जा रहे हैं। देश को स्वतंत्रता मिलने ही वाली है।

बर्बाद हुए मगर नहीं झुकाया सिर

सुंदरी बताती हैं कि फांसी के बाद दोनों भाइयों के शव भी दाह संस्कार के लिए परिवार को नहीं दिए गए थे। फांसी से कुछ दिन पहले ही जागो शाही की शादी हुई थी, लेकिन उनकी नवविवाहिता पत्नी को भी फांसी के वक्त अंग्रेजों ने पति के अंतिम दर्शन नहीं करने दिए थे। स्वतंत्रता के बाद तीसरे भाई पागो शाही जेल से छूटकर गांव लौट गए। चौथे भाई रामेश्वर शाही भी आंदोलन में सक्रिय रहे। स्वजन और ग्रामीण जयकांत शाही, नीलकांत शाही, रामविलास शाही, प्रह्लाद शाही आदि बड़े गर्व से कहते हैं कि देश को स्वतंत्र कराने में उनके गांव ने बर्बाद होकर भी सिर नहीं झुकाया।

हर घर में सुलग रही थी चिंगारी

कचनसा के भाइयों के अलावा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 20 घरों वाली इस बस्ती में दो दर्जन सेनानी थे। कोई घर इससे अछूता नहीं रहा। मौजूदा समय में गांव को इसका कोई लाभ नहीं मिला है। नई पीढ़ी के लोग उनके बलिदान को भी भूल चुके हैं। बलिदानी भाइयों की एक प्रतिमा या तस्वीर तक लोगों को उपलब्ध नहीं हो सकी। ग्रामीण बताते हैं कि दो सगे भाइयों को आजादी के आंदोलन में एक साथ फांसी का यह देश में अनोखा मामला है। आने वाली पीढ़ी निश्चित रूप से इसे भूल जाएगी। सरकार को इस इतिहास को स्वर्णिम करने की जरूरत है।

Edited By: Shubh Narayan Pathak