पटना, जेएनएन। भारतीय रिजर्व बैंक जब भी रेपो रेट में कटौती करता है तो ग्राहकों को उम्मीद रहती है कि इसका फायदा उन्हें भी मिलेगा, कर्ज की किस्त कुछ हल्की होगी, हालांकि हकीकत इससे परे है। रेपो रेट में कटौती का फायदा ग्राहकों को या तो मामूली मिलता है, या नहीं मिलता है। ताजा आंकड़ों पर गौर करें या फिर पुराने आंकड़ों को देखें, वास्तविकता यही है कि रेपो रेट में कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं मिलता है।


छह जून 2019 को भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति के तहत रेपो रेट में 0.25 फीसद की कटौती कर बैंकों को राहत दिया। बैंक अब आरबीआइ से शॉर्ट टर्म लोन 5.75 फीसद पर ले सकेंगे। हालांकि इस कटौती के बाद अभी तक बैंकों की ओर से इस राहत को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए कदम नहीं बढ़े हैं। आरबीआइ इसी साल इससे पहले भी दो बार रेपो दर घटा चुका है। इस तरह से आरबीआइ ने 2019 में ही बैंकों को रेपो रेट में कुल 0.75 फीसद की राहत दे चुका है। हालांकि, बैंकों की ओर से अपने ग्राहकों को इस अवधि में मात्र 0.21 फीसद की ही राहत ही दी गई है। पिछले पांच साल के आंकड़ों पर भी गौर करें तो भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को दिए जाने वाले कर्ज की दर यानी रेपो रेट में दो फीसद की कमी कर चुका है।


लेकिन बैंकों ने इस अवधि में अपने ग्राहकों को सिर्फ एक फीसद का ही लाभ दिया। जानकारों का कहना है कि बैंक बेस रेट में बदलाव तो करते हैं लेकिन इसका फायदा ग्राहकों को नहीं देते। दूसरी ओर ऋण की दरों में कटौती की जगह वे जमा दरों में वृद्धि कर देते हैं जिससे उनकी पूंजी में वृद्धि हो सके।

क्या है रेपो दर
रेपो वह दर है जिस पर देश के बैंक आरबीआइ से उधार लेते हैं। रेपो दर घटने से बैंक ज्यादा उधार ले सकते और उसे अपने ग्राहकों को सस्ती दरों पर दे सकते हैं।



ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ. कुमार अरविंद कहते हैं, रेपो रेट में कमी का अगर पूरा लाभ ग्राहकों को दे दिया जाए तो फिर जमाकर्ताओं के लिए भी दर में कमी करनी होगी। इससे नेट इंट्रेस्ट मार्जिन को मेंटेन करना मुश्किल होगा क्योंकि ऋण दर और जमा दर का अंतर ही बैंकों का लाभ होता है।

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