पटना/बक्‍सर, जागरण टीम। Ramleela of Buxar: दशहरा मेले के मौके पर रामलीला की परंपरा बिहार के ढेरों शहरों में रही है। पटना, गया, बक्‍सर जैसे शहरों में रामलीला को लेकर लोगों में जबर्दस्‍त उत्‍साह देखने को मिलता रहा है। बक्सर में तो पिछले 107 वर्षों से लगातार (केवल कोरोना महामारी के काल को छोड़कर) रामलीला का आयोजन हो रहा है। कोरोना महामारी के दौरान सरकार ने रामलीला की अनुमत‍ि नहीं दी, तब भी प्रतीक रूप में ही सही, इस परंपरा को जारी रखा गया था। 

हर साल होती है 22 दिनों की रामलीला और रासलीला 

बक्सर की पौराणिक धरती अपनी संस्कृति को संजोने के प्रति सजग व गंभीर है। यहां की रामलीला जिले की आध्यात्मिक पहचान है। वक्त के साथ आध्यात्मिक आयोजनों के प्रति शिथिलता आई, लेकिन दशहरा के अवसर पर होने वाली 22 दिनों की रामलीला के प्रति आज भी बक्सर वासियों का जुड़ाव पहले जैसा ही है। यहां के आयोजन में खास बात यह भी है कि जिउतिया के दिन ही हर साल रामलीला के साथ रासलीला का भी आयोजन होता है।

वृंदावन की मंडली करती है रामलीला का मंचन 

दशहरा महोत्सव के तहत दिन में रासलीला व रात को रामलीला का मंचन किया जाता है। जिससे एक तरफ श्रीकृष्ण का तो दूसरी तरफ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरित्र का साक्षात दर्शन होता है। 22 दिवसीय आयोजन के लिए वृंदावन की सुप्रसिद्ध मंडली को बुलाया जाता है। जिनके कलाकार रामलीला व रासलीला का मंचन करते हैं।

1915 में श्रीचंद्र मंदिर से शुरू हुई परंपरा

107 साल पूर्व 1915 में शहर के नया चौक स्थित श्रीचंद्र मंदिर पर पहली बार रामलीला की शुरूआत की गई थी। तब शैशवावस्था में होने के कारण यह आयोजन काफी छोटे स्तर पर स्थानीय कलाकारों के सहयोग से हो रहा था। उस समय संसाधन और आधुनिक तकनीक के अभाव में श्रीचंद्र मंदिर के अलावा लीला को प्रसंग के अनुसार जंगल, नदी व तालाब के समीप प्रदर्शित किया जाता था, ताकि लीला के प्रदर्शन में दृश्यात्मक मौलिकता दी जा सके। हर साल अश्विन कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि यानि जीवित्पुत्रिका व्रत की रात को लीला की शुरूआत होती है। जिसका समापन दशहरा के तीसरे दिन भरत मिलाप और राम के राज्याभिषेक के साथ सम्पन्न होता है।

1989 से किला मैदान में हो रहा संचालन

बदलते परिवेश व बढ़ती भीड़ को देखते हुए श्रीचंद्र मंदिर से रामलीला आयोजन को वर्ष 1989 में किला मैदान में स्थाई रूप से स्थानांतरित कर दिया गया। हालांकि इसका संगठनात्मक ढांचा 1941 में तैयार कर दिया गया था। 1941 में नगर के कतिपय बुद्धिजीवियों व व्यवसायी वर्ग के लोगों के प्रयास से 'श्री रामलीला समिति' का गठन हुआ था।

भगवान राम से जुड़ा है बक्‍सर का इतिहास

माना जाता है कि भगवान राम बक्‍सर आए थे और इसी जगह उन्‍होंने राक्षसी ताड़का का वध किया था। बक्‍सर में ही भगवान राम ने गौतम ऋषि की पत्‍नी देवी अहिल्‍या का उद्धार किया था। बक्‍सर में ही मुनि विश्‍वामित्र का आश्रम था। यहीं से भगवान राम माता सीता के स्‍वयंवर में भाग लेने के लिए जनकपुर रवाना हुए थे।

बक्‍सर की एक और रामलीला भी खास 

दशहरा मेले वाली रामलीला के अलावा भी बक्‍सर में श्रीसीताराम विवाह महोत्‍सव आश्रम की ओर से रामलीला का आयोजन किया जाता है। इस रामलीला का अतीत भी 50 साल से अधिक पुराना है। यह रामलीला अब तक अपने 52 पड़ाव पार कर चुकी है। हालांकि यह रामलीला दिसंबर के महीने में आयोजित की जाती है। इसकी शुरुआत स्‍थानीय संत महर्षि‍ खाकी बाबा सरकार के जन्‍मोत्‍सव पर होती है। इस आयोजन में खासकर बिहार के मिथ‍िला क्षेेत्र से आते हैं। प्रख्‍यात रामकथा वाचक मुरारी बापू इस आयोजन में कम से कम तीन बार आ चुके हैं।   

जन सहयोग से होता है यह आयोजन 

तब इसके लिए धन का जुगाड़ जिले के सभी व्यापारी व राइस मिलरों के सहयोग से किया जाता था। आज भी बिना किसी सरकारी सहायता के महज स्थानीय जन सहयोग से यह भव्य आयोजन होता है। साथ ही समिति के पास हर साल हुए आयोजन पर एक एक पैसे के आय और व्यय का लेखा-जोखा तैयार होता है।

Edited By: Shubh Narayan Pathak