पटना [सुभाष पांडेय]। आगामी छह मई को खाली हो रही बिहार विधान परिषद की 11 सीटों पर चुनाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी नेता प्रतिपक्ष बन जाएंगी। राजद के सात ही सदस्य होने के कारण उपसभापति हारून रशीद ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देने से इनकार कर दिया था। नेता प्रतिपक्ष के लिए सदन की संख्या का दस प्रतिशत सदस्य होना आवश्यक है।

विधान परिषद में सदस्यों की संख्या 75  हैं। नेता प्रतिपक्ष के लिए कम से कम आठ सदस्य होना जरूरी है। अगले महीने होने जा रहे द्विवार्षिक चुनावों के बाद राजद के सदस्यों की संख्या बढ़कर दस हो जाएगी। इस बार उसकी सीटों में तीन सीटों का इजाफा होगा। कांग्रेस की भी एक सीट बढ़ेगी। जदयू की तीन और भाजपा की एक सीट घट जाएगी।

जदयू से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, संजय सिंह, चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी, उपेंद्र प्रसाद, राजकिशोर कुशवाहा और नरेंद्र सिंह, भाजपा के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय, लाल बाबू प्रसाद और सत्येंद्र नारायण सिंह तथा राजद की राबड़ी देवी का छह साल का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।

 निर्वाचन आयोग विधानसभा कोटे से भरी जाने वाली रिक्त हो रही इन सीटों पर चुनाव के लिए किसी भी समय अधिसूचना जारी कर सकता है। राजनीतिक हलके में चर्चा हैं कि राज्यसभा की तरह विधान परिषद की खाली हो रही इन सीटों पर भी मतदान की शायद ही नौबत आए।

इस बार विधान परिषद की सीट जीतने  के लिए 21 वोट की दरकार है। विधानसभा में राजद के 79 और कांग्रेस के 27 सदस्य है। राजद के चार प्रत्याशी को जीतने के लिए पांच वोट कम है जबकि कांग्रेस के एक प्रत्याशी की जीत के लिए आवश्यक 21 वोट के अलावा छह सरप्लस वोट हैं।

कांग्रेस के छह सरप्लस वोट से राजद का चौथा प्रत्याशी भी आसानी से जीत जाएगा। राज्यसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी अखिलेश प्रसाद सिंह राजद के सरप्लस वोट के बूते ही निर्वाचित होंगे। ऐसे में राजद को विधान परिषद में कांग्रेस के सरप्लस वोट लेने में वैसे भी कोई दिक्कत नहीं होगी।

विधान परिषद में अशोक चौधरी के नेतृत्व में कांग्रेस के चार सदस्यों के जदयू में शामिल होने के बाद जदयू के 33, भाजपा के 22, कांग्रेस के दो, भाजपा के दो, लोजपा के दो, रालोसपा के एक और तीन निर्दलीय सदस्य है। जदयू के नरेंद्र सिंह की सदस्यता समाप्त होने के कारण एक सीट रिक्त है।

By Ravi Ranjan