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राबड़ी देवी बनाम सम्राट सरकार: आवास विवाद में कौन साध रहा राजनीतिक निशाना?

Published: Sat, 06 Jun 2026 08:46 AM (IST)

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर बिहार में राजनीतिक विवाद गहरा गया है, जहां वह इसे खाली ...और पढ़ें

10 सर्कुलर रोड बंगला पर खूब हो रही सियासत।

10 सर्कुलर रोड बंगला पर खूब हो रही सियासत।

HighLights

  1. राबड़ी देवी सरकारी आवास खाली करने से कर रहीं इनकार।

  2. सरकार ने आवास भाजपा मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित किया।

  3. आवास विवाद पर राजद-भाजपा में राजनीतिक घमासान तेज।

अरुण अशेष, पटना। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर फिल्मी संवाद चल रहा है। राबड़ी देवी कह रही हैं कि वह सरकारी आवास नहीं छोड़ेंगी।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कह रहे हैं कि कोई माई का लाल सरकारी आवास पर कब्जा नहीं कर सकता है। यह संपत्ति किसी की बपौती नहीं है।

राबड़ी देवी के समर्थक और राजद नेता सूची जारी कर रहे हैं। इनमें उन लोगों के नाम हैं, जो मंत्री नहीं हैं। सांसद हैं। पूर्व विधायक हैं।

वे उन आवासों में रह रहे हैं, जिनका निर्माण राज्य के मंत्रियों और बड़े सरकारी अधिकारियों के लिए किया गया है।

बाजार दर पर किराया देकर रह रहे आवास में

सरकार की ओर से भवन निर्माण मंत्री लेशी सिंह सफाई दे रही हैं कि राजद की सूची में जिन्हें अवैध कब्जेदार बताया जा रहा है, वे सब बाजार दर पर किराया देकर सरकारी आवासों में रह रहे हैं।

सरकारी भवनों के आवंटन के नियम में किराया भी एक आधार है। हां, यह सरकार के विवेक पर निर्भर है कि वह किसे किराया पर आवास देगी।

ऐसा नहीं है कि कोई आम आदमी सरकारी कार्यालय में जाए और किराया का भुगतान कर मंत्री वाले आवास में रहने लगे।

कुल मिलाकर बात यहां आकर ठहरती है कि सरकार जिसे चाहे, उसे ही किराये पर मंत्री वाला आवास मिल सकता है। प्रश्न यह भी नहीं है कि राबड़ी देवी के पास राजधानी पटना में रहने का कोई और ठिकाना है या नहीं।

अनुसूचित जाति‍ के मंत्री का हवाला 

उन्हें वर्तमान आवास के बदले दूसरा आवास आवंटित किया गया है। वह आवास छोटा नहीं है। प्रश्न यह भी नहीं है कि राज्य सरकार अगर राबड़ी देवी को वर्तमान आवास में रहने देगी तो राज्य का बहुत नुकसान हो जाएगा।

असली मामला राजनीति का है। सरकार ने राबड़ी देवी वाला आवास भाजपा कोटे के मंत्री नंदकिशोर राम के नाम आवंटित कर दिया है।

भाजपा कह रही है कि देखिए, राबड़ी देवी किस तरह अनुसूचित जाति की विरोधी हैं। अनुसूचित जाति के मंत्री के नाम पर आवंटित किए गए आवास को खाली नहीं कर रही हैं।

जबरन आवास खाली कराने की चाहत में राजद

उधर राजद की राजनीति यह है कि सरकार जबरदस्ती आवास खाली कराए। उनके सामान को सड़क पर फेक दे। तब कहा जाएगा कि सरकार महिला विरोधी है।

पिछड़ा विरोधी है। राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री का सम्मान करना नहीं जानती है। आम लोग तमाशा देख रहे हैं। बीच-बीच में ये खबरें भी आ रही हैं कि सरकार जबरदस्त ढंग से अतिक्रमण हटाओ अभियान चला रही है।

बिना वैकल्पिक प्रबंध के गरीबों की झोपड़ियां उजाड़ी जा रही हैं। यह रुचिपूर्ण विषय नहीं है। अधिक रुचि इसमें है कि राबड़ी देवी आवास खाली करती हैं या नहीं।

वस्तुत: सरकारी आवासों पर विवाद कोई नया विषय नहीं है। बचपन की अपनी गरीबी का बखान करते-करते आंसू निकाल लेने वाले लोग जब जन प्रतिनिधि बनकर पटना पहुंचते हैं तो उनकी पहली खोज एक भव्य सरकारी आवास की होती है।

अब तो सरकार ने विधानसभा क्षेत्र संख्या के आधार पर आवास का निर्माण और आवंटन कर दिया है। इससे पहले तो नव निर्वाचित विधायक और उनके समर्थक परिणाम की घोषणा होते ही पटना पहुंच कर किसी भव्य आवास पर कब्जा जमाने का प्रयास करते थे।

लालू प्रसाद का प्रसंग भी प्रासंग‍िक

देखा यह जाता था कि वह आवास किसी पराजित विधायक या मंत्री का हो। खैर यह परिपाटी बंद हो गई है। लेकिन, भव्य और सुसज्जित आवास की भूख नहीं गई है।

सरकार ने उन लोगों का भी सम्मान किया है, जो कभी मंत्री थे और अब केवल विधायक रह गए हैं। इनके लिए मांग के आधार पर दोहरे आवास की व्यवस्था की गई है।

एक तो इन्हें विधायक के नाम पर मुफ्त मिलेगा। दूसरे के लिए इन्हें भुगतान करना होगा। डेढ़ दर्जन से अधिक विधायकों को पूर्व मंत्रियों के नाते यह सुविधा मिली हुई है। दोष इन जन प्रतिनिधियों का भी नहीं है।

लालू प्रसाद मार्च, 1990 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। अपनी मां से मिलने गांव गए। उनकी सीधी सरल मां समझ नहीं पाईं कि उनका बेटा कितना बड़ा आदमी बन गया है।

लालू प्रसाद का गांव फुलवरिया, गोपालगंज जिले में है। इसी जिले में हथुआ राज भी है। लालू प्रसाद ने अपनी मां को मुख्यमंत्री पद की महत्ता समझाने की गरज से कहा कि वे हथुआ महाराज से भी बड़े ओहदे पर चले गए हैं।

मां हथुआ महाराज के प्रताप को समझती थीं। वह अपने पुत्र के प्रताप को समझ गईं। लालू प्रसाद बिंदास प्रकृति के हैं। लेकिन, सभी जन प्रतिनिधि ऐसे नहीं हैं कि अपने मन के राजा को सब जनता के बीच प्रकट कर सकें।

राजा हैं तो राज प्रासाद भी चाहिए। अपवाद को छोड़ दें तो ज्यादा जन प्रतिनिधि इसी मनोभाव के हैं।

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