पटना। बसारत है तो हर अनदेखा मंजर देख सकते हो, जो पत्थर में है पोशीदा वो ठोकर देख सकते हो।

नजर में कोई मंजिल है तो मौजे-वक्त को देखो, वरना तुम भी साहिल से समुंदर देख सकते हो।

जब मशहूर शायर रफीउद्दीन राज ने अपनी गजलें और नज्में सुनाई तो खचाखच भरे आइएमए हॉल ने तालियों से उनका इस्तकबाल किया। मौका था जन संस्कृति मंच की ओर से मशहूर शायर रफीउद्दीन राज की गजलों और नज्मों के पाठ का का। इससे पहले डॉ. अरमान नज्मी ने उनका परिचय कराते हुए उनकी शायर की शख्सियत को बिहार की विभिन्न भाषाओं की काव्य-परंपरा और सास्कृतिक परंपरा से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि वे हमारी बिरादरी के ही बिछड़े हुए हमसफर हैं, जिनकी मिट्टी की गंध बार-बार बिहार खींच लाती है।

मूलत: गजलों और नज्मों की रचना करने वाले रफीउद्दीन राज ने गजलों और नज्मों के अतिरिक्त आज कत्आ, रुबाई, दोहे और हाइकू भी सुनाए। उनकी गजलों में पुरानों उस्ताद की शायरों की रवायत के साथ-साथ आज की हकीकत के अक्स मौजूद थे। उन्होंने खुद को अमन का सिपाही बताया और मुहब्बत को बढ़ावा देने पर जोर दिया। अपनी गजल में उन्होंने ऊंच-नीच के भेद को गलत बताया और कहा कि जब एक जैसे दुख हैं, तो भेदभाव कैसा।

उनका एक शेर मानो खुद उन्हीं के लिए था-

किसी से पूछते क्या हो, जबीनों पर नजर डालो

लकीरें खुद कहेंगी किसने कितनी खाक छानी है।

रफीउद्दीन राज ने उर्दू को भारतीय जबान बताते हुए कहा कि इस पर यहा की सारी जबानों का असर है। उनकी खुशनसीबी है कि आज उनको सुनने वालों में कई जबानों के लोग हैं।

संचालन करते हुए जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने रफीउद्दीन राज के तीन शेर सुनाए। धन्यवाद ज्ञापन शायर संजय कुमार कुंदन ने किया। इस अवसर पर शायर कासिम खुर्शीद, कथाकार अवधेश प्रीत, कवि रंजीत वर्मा, अनिल विभाकर, राजेश कमल, अंचित, मो. गालिब, अनीश अंकुर, अनुराधा, पुष्पराज, रंगकर्मी संतोष झा, प्रीति प्रभा, सुमन कुमार, राम, राजन आदि मौजूद थे।

परदेश में जला रही है उर्दू की मशाल

21 अप्रैल 1938 को बेगूसराय, बिहार में जन्मे रफीउद्दीन राज कनाडा और न्यूयार्क में रहते हैं। उनका पैतृक घर दरभंगा में है। जीवन में वे विभाजन और युद्ध की त्रासदी से गुजरे। रोजगार के लिए छोटी उम्र से ही कंडक्टरी और ड्राइवरी से लेकर कई तरह के काम-धंधे उन्होंने किए। उनके गजलों का पहला संग्रह- दीदा-ए-खुशख्वाब 1988 में आया। उसके बाद बिनाई, पैराहने फिक्र, अभी दरिया में पानी है, रौषनी के खदोखाल, इतनी तमाजत किस लिए, जो एक दिन आईना देखा, साजो-राज आदि कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

Posted By: Jagran

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