अगस्त्य अर्घ्य के साथ पितृपक्ष शुरू, 10 को महालया के साथ समापन; 3 अक्टूबर को एक दिन होगा सप्तमी-अष्टमी का श्राद्ध
पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो गया है, जिसमें 27 सितंबर से श्राद्ध कर्म आरंभ होंगे और 10 अक्टूबर को ...और पढ़ें

मघा श्राद्ध से चतुर्दशी तक चलेगा क्रम
HighLights
पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू, 27 सितंबर से श्राद्ध कर्म आरंभ।
3 अक्टूबर को सप्तमी और अष्टमी का श्राद्ध एक ही दिन।
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या, महालया के साथ समापन।
जागरण संवाददाता, पटना। पितरों के स्मरण, पितृऋण के निर्वहन और कुल परंपरा के संरक्षण का विशेष काल पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू हो गया। शनिवार को अगस्त्य-अर्घ्य दान के बाद 27 सितंबर से श्राद्ध कर्म आरंभ होगा। ज्योतिष आचार्य डा. राजनाथ झा के अनुसार तीन अक्टूबर को सप्तमी और अष्टमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा।
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या और महालया के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। अर्घ्य में जल के साथ अक्षत, कुश, दूर्वा, श्वेत पुष्प और विशेष रूप से काश-पुष्प के प्रयोग की परंपरा है। अर्घ्य पात्र को मस्तक से स्पर्श कराने का भी विधान बताया गया है।
श्राद्ध और तर्पण में होता है अंतर
जल के माध्यम से पितरों की तृप्ति के लिए किया जाने वाला कर्म तर्पण कहलाता है, जबकि निर्धारित पितृ तिथि पर संकल्पपूर्वक किया जाने वाला व्यापक कर्म श्राद्ध कहा जाता है। श्राद्ध में पितृ पूजन, पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण-सत्कार एवं भोजन और दान आदि शामिल होते हैं।
पितृ तर्पण के दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की मान्यता है। पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं।
तिथि के अनुसार होगा श्राद्ध
28 सितंबर को द्वितीया, 29 सितंबर को तृतीया और 30 सितंबर को चतुर्थी का श्राद्ध होगा। एक अक्टूबर को पंचमी और दो अक्टूबर को षष्ठी का श्राद्ध किया जाएगा।
तीन अक्टूबर को सप्तमी और अष्टमी का श्राद्ध एक ही दिन होगा। चार अक्टूबर को नवमी, पांच अक्टूबर को दशमी और छह अक्टूबर को एकादशी का श्राद्ध किया जाएगा।
मघा श्राद्ध से चतुर्दशी तक चलेगा क्रम
सात अक्टूबर को द्वादशी एवं मघा श्राद्ध होगा, जबकि आठ अक्टूबर को त्रयोदशी का श्राद्ध किया जाएगा। नौ अक्टूबर को चतुर्दशी का श्राद्ध होगा।
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या और महालया के साथ पितृपक्ष का समापन होगा। इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध किया जाता है, जिनकी तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो।
मिथिला में पंचांग और कुलाचार महत्वपूर्ण
मिथिला में पितृ कर्म के लिए स्थानीय पंचांग, कुलाचार और देशाचार का विशेष महत्व माना जाता है। पितृ की मृत्यु की चंद्र तिथि के अनुसार संबंधित तिथि में श्राद्ध किया जाता है।
पंडित राकेश झा के अनुसार केवल अंग्रेजी तारीख के आधार पर पितृ कर्म निर्धारित करने के बजाय स्थानीय प्रमाणिक पंचांग के अनुसार तिथि और पावन काल का निर्धारण करना उचित माना जाता है।
पितृपक्ष में पूर्वजों के संस्कारों का स्मरण
पितृपक्ष को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं माना जाता। यह पूर्वजों से मिले संस्कार, ज्ञान, परंपरा और जीवन-मूल्यों को याद करने का अवसर भी है।
अगस्त्य-अर्घ्यदान से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक चलने वाली यह परंपरा पितृस्मरण, तर्पण, दान और पारिवारिक संस्कारों की निरंतरता का संदेश देती है।
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