पटना [सुनील राज]। हर बंदे को खींच रही है साहिब-ए-कलाम बादशाह दरवेश गुरू गोविंद सिंह से मिलने की ख्वाहिश। लोग चले आ रहे हैं। बगैर कोई परवाह किए, बेफिक्र। अफ्रीका, यूके, आयरलैंड, कनाडा, अमेरिका के साथ ही लुधियाना, अमृतसर, मोगा, भटिंडा, चंडीगढ़, नांदेड़ और न जाने कहां-कहां से। एक जज्बा है जो उफान मार रहा है।

दस साल का मासूम इंदर दादा की अंगुली पकड़ अभी कुछ वक्त पहले बाल लीला गुरुद्वारे पहुंचा है। इधर तख्त साहिब में इंद्रजीत बाबा सरहद पार से आने वाले भक्तों के रहने-सहने के प्रबंध में व्यस्त हैं। विदेशों से भक्त आने लगे हैं। कोई कसर बाकी न रहे, प्रयास इसके हैं।

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सतनाम सिंह ने तकरीबन दस साल पहले ट्रेन दुर्घटना में दोनों पैर खो दिए। पर हिम्मत नहीं हारी। अपने साहिब-ए-कलाम से मिलने ट्राई साइकिल पर सवार होकर चल पड़े और आखिर पहुंच ही गए दरबारं।

तख्त साहिब आए किसी भक्त को कोई कष्ट न हो, सो हर बंदा सिपाही की मानिंद डटा है। जिम्मेदारियों ने ईमानदारी पहन ली है। किशनलाल हो या भोला या फिर इनके जैसे 1200 सफाई कर्मचारी, सब दिन रात डटे हैं। धूल, गंदगी का एक कण भी फिलहाल इन्हें बर्दाश्त नहीं।

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इधर, प्रसाद घर का मंजर कुछ ऐसा ही है। अभिजीत सिंह, दमनजीत सिंह और असरजीत सिंह को सांस लेने की फुर्सत नहीं। तीन वेंडिंग मशीने लगातार प्रसाद पैक कर रही हैं, पर दरकार काम में और तेजी की महसूस हो रही है। पिन्नी बांधने वाले कारीगर के बूते नहीं कि इतनी पिन्नियां एक साथ बांध सकें नतीजा रास्ता निकाला गया है और पंजीरी की पैकिंग हो रही है। मामूली काम है भी नहीं। पांच लाख से अधिक पैकेट बनाना और उनकी पैकिंग करना तब भक्तों को सौंपना। पचास सेवादार लगे हैं पर ये कोई मामूली काम नहीं।

बाहर के मुल्कों से आने वाली संगत और सेवादारों ने भी गुरु के सिपाही की भांति अपने काम पहले ही तय कर लिए हैं और बकायदा इसकी जानकारी भी तख्त प्रबंधन को दे दी है। इनमें बड़ी बड़ी कंपनियों के सीईओ, डारेक्टर, चीफ फाइनेंशियल अफसर और कोई बड़े बिजनेस घराने का मालिक भले ही हो, लेकिन कल जब वह गुरु साहिब के दरबार में शीश नवाने आएगा तो किसी सेवक की तरह। कोई जोड़ा घर की सेवा में जुटेगा कोई लंगर सेवा में। कोई सीढिय़ां साफ करेगा तो कोई चंवर डोलाएगा। दरबार में आकर छोटे-बड़े के सारे फासले मिट जाएंगे। इन सबके बदले एक नियामत मिलेगी और वह है साहिब-ए-कलाम के दर्शन की नियामत।

Edited By: Amit Alok