टेंट से बहुमंजिली इमारतों तक 125 परिवारों की कहानी, 1947 में पटना आए सिख परिवार; ऐसे बनी रिफ्यूजी से पंजाबी कॉलोनी
1947 के विभाजन के बाद 125 सिख परिवार पटना आकर बसे, जिन्होंने टेंट से शुरुआत कर रिफ्यूजी कॉलोनी (अब पंजाबी ...और पढ़ें

टेंट में शुरू हुई जिंदगी, फिर मिला अपना ठिकाना
HighLights
1947 में 125 सिख परिवार विभाजन के बाद पटना आए।
टेंट से शुरू होकर रिफ्यूजी कॉलोनी बनी पंजाबी कॉलोनी।
सात दशकों में बहुमंजिली इमारतों में बदली यह बस्ती।
जागगण संवाददाता, पटना। 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन विभाजन की त्रासदी ने लाखों परिवारों को अपनी जड़ें छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इन्हीं परिवारों में 125 सिख परिवार ऐसे थे, जो अपना घर-बार छोड़कर पटना पहुंचे। आंखों में बिछड़ने का दर्द था और सामने अनजान शहर में जिंदगी दोबारा शुरू करने की चुनौती।
बीएमपी कैंप के पास टेंट और झोपड़ियों से उनकी नई जिंदगी शुरू हुई। आज करीब सात दशक बाद वही इलाका बहुमंजिली इमारतों और कई पीढ़ियों की पहचान बन चुका है।
टेंट में शुरू हुई जिंदगी, फिर मिला अपना ठिकाना
पटना आने के बाद इन परिवारों के लिए टेंट और झोपड़ियां ही आशियाना थीं। सुबह होते ही रोजी-रोटी की तलाश और शाम को उसी अस्थायी ठिकाने पर वापसी, यही दिनचर्या थी।
वर्ष 1950 में सरकार ने इन विस्थापित परिवारों को स्थायी ठिकाना देने की पहल की। चितकोहरा में करीब चार एकड़ 47 डिसमिल जमीन अधिग्रहित कर 125 परिवारों को बसाया गया।
प्रत्येक परिवार के लिए 650 वर्गफीट में करीब 500 रुपये की लागत से मकान बनवाया गया। इस बस्ती का नाम रखा गया रिफ्यूजी कॉलोनी। धीरे-धीरे समय बदला और रिफ्यूजी कॉलोनी की पहचान पंजाबी कॉलोनी के रूप में होने लगी।
जिन घरों में बसी पहली पीढ़ी, वहां अब खड़ी हैं बहुमंजिली इमारतें
करीब सात दशक में कॉलोनी का चेहरा पूरी तरह बदल गया। जिन छोटे मकानों में विस्थापित परिवारों ने नई जिंदगी की नींव रखी थी, उनकी जगह अब बहुमंजिली इमारतों ने ले ली है।
हालांकि तीन-चार पुराने मकान आज भी मौजूद हैं। इनमें अब कोई नहीं रहता, लेकिन ये इमारतें उस दौर की खामोश गवाह हैं, जब विभाजन के बाद परिवार यहां आकर बसे थे।
आज उन्हीं 125 परिवारों की नई पीढ़ियां इस कॉलोनी में रह रही हैं। किसी ने घर से कारोबार शुरू किया तो किसी ने दुकान या फैक्ट्री लगाई।
कई परिवारों ने पटना के अलग-अलग हिस्सों में व्यापार फैलाया। एक समय जो जगह मजबूरी में मिली थी, वही अब कई पीढ़ियों की पहचान बन चुकी है।
परदादा आए थे शरण लेकर, अब यही जन्मभूमि और पहचान
कॉलोनी के बुजुर्गों की यादों में आज भी विस्थापन का वह दौर जीवित है। स्थानीय लोगों के मुताबिक उनके परदादा जिस जगह को मजबूरी में अपना ठिकाना बनाकर आए थे, आज वही उनकी कई पीढ़ियों की पहचान है। समय के साथ घर बदले, परिवार बढ़े और कारोबार आगे बढ़ा, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ाव कायम रहा।
जगजीवन सिंह कहते हैं कि उनके दादा-परदादा यहां आकर बसे थे। उनका जन्म भले पटना में हुआ, लेकिन अब यही जगह उनके परिवार की पहचान बन चुकी है। नीतू कौर के मुताबिक कई पीढ़ियां इसी कॉलोनी में रह रही हैं और अब यह उनके परिवार का स्थायी ठिकाना है।
तरक्की के बीच जलजमाव और सफाई बनी पुरानी परेशानी
कॉलोनी ने जहां विस्थापन से विकास तक का लंबा सफर तय किया, वहीं स्थानीय लोगों की कुछ समस्याएं अब भी बरकरार हैं।
नगर निगम की सामान्य सुविधाएं मिलने के बावजूद जलजमाव, साफ-सफाई और जलनिकासी की समस्या लोगों को परेशान करती है। बरसात में कई जगह पानी जमा हो जाता है।
कमलजीत सिंह और मंजीत कौर के मुताबिक नालियों की सफाई और नियमित कचरा उठाव पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। उनका कहना है कि बारिश के दौरान जलनिकासी की समस्या बढ़ जाती है और घरों के आसपास पानी जमा होने से परेशानी होती है।
पुरानी सड़कों पर नई पीढ़ी का सफर
गुरप्रीत कौर और कंवरजीत सिंह के अनुसार कॉलोनी की कई सड़कें अब टूट-फूट चुकी हैं। बरसात में पानी निकलने में परेशानी होती है। स्थानीय लोग सड़क निर्माण के साथ नालियों की व्यवस्था दुरुस्त करने और नियमित साफ-सफाई की मांग कर रहे हैं।
पंजाबी कॉलोनी की कहानी सिर्फ एक बस्ती के बदलते स्वरूप की कहानी नहीं है। यह उन 125 परिवारों की यात्रा भी है, जिन्होंने विभाजन के बाद सब कुछ पीछे छोड़कर पटना में जिंदगी की नई शुरुआत की।
टेंट और झोपड़ियों से शुरू हुआ सफर आज पक्के मकानों, बहुमंजिली इमारतों, कारोबार और कई पीढ़ियों की पहचान तक पहुंच चुका है।
रिफ्यूजी कॉलोनी का नाम भले बदल गया हो, लेकिन उसकी कहानी आज भी यहां की गलियों और पुराने मकानों में दर्ज है।
