पटना के रावण दहन की कहानी में लाहौर और लालू प्रसाद का कनेक्शन, कभी 300 रुपये से हुई थी शुरुआत
पटना के गांधी मैदान में रावण दहन की परंपरा देश विभाजन के बाद पंजाबी समुदाय द्वारा 1954 में शुरू हुई थी, जो आज एक भव्य आयोजन बन चुका है।

पटना के गांधी मैदान में रावण दहन। जागरण आर्काइव
HighLights
विभाजन के बाद पंजाबी समुदाय ने की शुरुआत।
युद्ध और बाढ़ में आयोजन स्थगित कर राहत कार्य।
लालू प्रसाद की उपस्थिति से मिली व्यापक पहचान।
प्रभात रंजन, पटना। गांधी मैदान में हर साल रावण दहन देखने उमड़ने वाली भीड़ और आयोजन की भव्यता आज पटना की पहचान बन चुकी है।
लेकिन इस परंपरा की शुरुआत महज तीन सौ रुपये के चंदे से हुई थी। देश विभाजन के बाद पटना आए पंजाबी समुदाय के कुछ लोगों ने वर्ष 1954 में श्री दशहरा कमेटी ट्रस्ट का गठन कर इसकी नींव रखी।
अगले वर्ष 1955 में गांधी मैदान में पहली बार रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया गया। लाहौर के पास गुजरेवाला गांव से पटना आए बख्शी राम गांधी ने अपने भाइयों और सहयोगियों के साथ इस आयोजन की शुरुआत की थी।
सीमित संसाधनों से शुरू हुआ यह प्रयास समय के साथ शहर के प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों में शामिल हो गया। आज आयोजन पर 30 से 35 लाख रुपये तक खर्च होते हैं।
इसकी कहानी केवल रावण दहन की भव्यता नहीं, बल्कि सामुदायिक सहयोग, सांस्कृतिक पहचान और संकट के समय सामाजिक दायित्व निभाने की भी है।
40 फीट का रावण, देखने उमड़ा था शहर
दशहरा कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष अरुण कुमार के अनुसार, वर्ष 1955 में गांधी मैदान में हुए पहले आयोजन में रावण का 40 फीट, कुंभकर्ण का 30 फीट और मेघनाद का 20 फीट ऊंचा पुतला बनाया गया था।
इन पुतलों को गया के एक मुस्लिम कारीगर ने तैयार किया था। आयोजन के लिए शहर के लोगों से चंदा जुटाया गया। आरके मल्होत्रा, पीके कोचर, पीआर मेहता, दुर्गा प्रसाद शर्मा, प्रेमनाथ अरोड़ा, ओपी बिहारी और संतोष चंद्रा समेत कई लोगों ने सहयोग दिया।
संसाधन सीमित थे, लेकिन आयोजन को लेकर उत्साह ऐसा था कि पुतला दहन देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।विजयादशमी के दिन पाल होटल से राम, लक्ष्मण और वानर सेना की झांकी ट्रैक्टर पर निकलती थी। नगर भ्रमण के बाद झांकी गांधी मैदान पहुंचती थी। रास्ते में भी इसे देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटती थी।

युद्ध और बाढ़ में उत्सव से पहले निभाया सामाजिक दायित्व
गांधी मैदान में रावण दहन की परंपरा कई बार राष्ट्रीय संकट और प्राकृतिक आपदा के कारण रुकी। अरुण कुमार के अनुसार, 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान आयोजन स्थगित कर चंदे की राशि राहत कोष में दी गई।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भी रावण दहन नहीं हुआ। वर्ष 1975 में पटना में आई बाढ़ के कारण भी आयोजन स्थगित करना पड़ा।
उस समय कमेटी ने बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए राशि जुटाई। कोरोना काल में भी परंपरा का स्वरूप बदल गया। उस दौरान वृंदावन में पांच सदस्यों ने सीमित स्तर पर रावण दहन किया। वर्ष 2022 में पटना के कालिदास रंगालय में छोटे पुतले के साथ कार्यक्रम आयोजित किया गया।
लालू प्रसाद के शामिल होने के बाद बढ़ी पहचान
वर्ष 1990 के बाद गांधी मैदान के दशहरा आयोजन को व्यापक पहचान मिली। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद पहली बार मुख्य अतिथि के रूप में रावण दहन कार्यक्रम में शामिल हुए। इसके बाद मुख्यमंत्री, राज्यपाल और अन्य प्रमुख हस्तियों की उपस्थिति आयोजन का हिस्सा बनने लगी।
समय के साथ आयोजन की लोकप्रियता और दर्शकों की संख्या बढ़ती गई। गांधी मैदान का रावण दहन पटना के प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों में शामिल हो गया।
बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन ने संभाली आर्थिक जिम्मेदारी
शुरुआती दौर में आयोजन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना बड़ी चुनौती थी। बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के तत्कालीन मालिक दुर्गा प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में कमेटी ने आयोजन को आगे बढ़ाया। इसके खर्च में बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन का प्रमुख योगदान रहता था। कमेटी के अन्य सदस्य भी आर्थिक सहयोग करते थे।
उस दौर में शहर में आइसक्रीम फैक्ट्री के नाम से एक कोल्ड स्टोरेज था, जहां किसान अपनी फसल रखने आते थे। आयोजन के लिए वहां भी चंदा जुटाया जाता था। लोगों के छोटे-छोटे योगदान से शुरू हुई यह परंपरा आज लाखों रुपये के बजट तक पहुंच चुकी है।
मिलर हाई स्कूल से नागाबाबा ठाकुरबाड़ी तक पहुंची रामलीला
पटना के दशहरा उत्सव में रावण दहन के साथ रामलीला और भरत मिलाप की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। दशहरा कमेटी ने वर्ष 1984 में पहली बार मिलर हाई स्कूल मैदान में रामलीला का आयोजन किया था। दूसरे स्थानों से आए कलाकार नौ दिनों तक रामकथा का मंचन करते थे।
बाद में रामलीला कदमकुआं स्थित नागाबाबा ठाकुरबाड़ी में आयोजित होने लगी, जहां वृंदावन के कलाकार रामकथा के प्रसंगों को जीवंत करते हैं।
रावण दहन के अगले दिन नागाबाबा अखाड़ा से भरत मिलाप की झांकी गांधी मैदान पहुंचती है। इस दौरान श्रद्धालु श्रीराम के स्वागत में फूल बरसाते हैं। रथ पर विराजमान श्रीराम के अभिनंदन के लिए सड़क के दोनों ओर भीड़ जुटती है।
तीन सौ रुपये से लाखों के बजट तक का सफर
गांधी मैदान का रावण दहन केवल पुतलों के आकार और आयोजन के बजट में हुई वृद्धि की कहानी नहीं है। यह विभाजन के बाद पटना आए लोगों के अपनी सांस्कृतिक पहचान कायम करने के प्रयास और शहरवासियों के सामूहिक सहयोग का भी उदाहरण है।
युद्ध और बाढ़ के समय आयोजन रोककर राहत कार्यों को प्राथमिकता देना और कठिन दौर में परंपरा को नए स्वरूप में जारी रखना इसकी खासियत रही है।
छह दशक से अधिक पुरानी इस परंपरा में पुतलों का आकार बढ़ा, बजट लाखों में पहुंचा और दर्शकों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन इसकी बुनियाद आज भी सामुदायिक सहयोग और सामाजिक सहभागिता पर टिकी है।
