पटना में पूरी हुई ‘रश्मिरथी’, यहीं परवान चढ़ी दिनकर की कलम; जलेबी से लेकर जेपी आंदोलन तक जुड़ी हैं कई यादें
दिनकर की साहित्यिक यात्रा में पटना का महत्वपूर्ण स्थान रहा, जहाँ उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और 'रश्मिरथी' जैसी कृतियों ...और पढ़ें

फाइल फोटो
HighLights
दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की।
'रश्मिरथी' का समापन पटना में हुआ, जो उनकी पहचान बनी।
जयप्रकाश नारायण और जलेबी से जुड़ी हैं दिनकर की यादें।
जागरण संवाददाता, पटना। पटना की धरती रामधारी सिंह दिनकर की साहित्यिक यात्रा की अहम गवाह रही है। युवा दिनकर ने यहीं उच्च शिक्षा हासिल की, सरकारी सेवा की और बाद के वर्षों में ‘उदयाचल’ उनका साहित्यिक केंद्र बना। उनके पौत्र अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि ‘रश्मिरथी’ लिखने की शुरुआत पूर्णिया में हुई थी, लेकिन इसका समापन पटना में हुआ। 1952 में प्रकाशित यह कृति आज भी उनकी पहचान का अहम हिस्सा है।
पटना विश्वविद्यालय से शुरू हुआ सफर
1928 में मैट्रिक के बाद दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में स्नातक किया। इसके बाद बिहार सरकार की सेवा में आए और सब-रजिस्ट्रार के रूप में काम किया। इसी दौरान ‘रेणुका’, ‘हुंकार’ और अन्य रचनाओं के जरिए उनकी साहित्यिक पहचान मजबूत होती गई।
कविता पढ़ने के लिए आवाज जरूरी मानते थे दिनकर
पौत्र अरविंद कुमार सिंह के अनुसार, दिनकर कविता का पाठ ऊंची आवाज में करते थे। परिवार के लोग उन्हें ऐसा करने से रोकते थे, क्योंकि इससे उनकी तबीयत प्रभावित होती थी।
दिनकर का मानना था कि कविता को जोर से पढ़ने पर ही उसके शब्दों का प्रवाह शरीर में उतरता है। खाने-पीने में सादगी पसंद थी, लेकिन पटना की जलेबी उन्हें खूब पसंद थी।
नाला रोड की जलेबी और रेणु की दोस्ती
दिनकर पटना में नाला रोड के पास की दुकान से जलेबी मंगवाकर खाते थे। दिल्ली में रहने के दौरान भी चांदनी चौक की जलेबी उनकी पसंद बनी रही।
फणीश्वरनाथ रेणु से भी उनका गहरा आत्मीय संबंध था। परिवार के मुताबिक, रेणु जब दिनकर से मिलने आते तो उनके लिए जलेबी जरूर लेकर आते थे।
जेपी के लिए गांधी मैदान में पढ़ी थी कविता
लोकनायक जयप्रकाश नारायण से दिनकर का गहरा संबंध रहा। 1946 में जेपी के जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने उनके लिए कविता लिखी।
बाद में जेपी आंदोलन के दौरान गांधी मैदान में दिनकर ने जयप्रकाश नारायण को समर्पित कविता का पाठ किया। उनकी कविता ने आंदोलन के दौर में लोगों के बीच चेतना जगाने का काम किया।
ब्रिटिश सरकार ने ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ के बाद किया तबादला
1934 में दिनकर ने पटना निबंधन कार्यालय में सब-रजिस्ट्रार के रूप में काम शुरू किया। 1935 में ‘रेणुका’ के प्रकाशन के बाद उनका तबादला पटना से बाढ़ कर दिया गया।
1938 में ‘हुंकार’ प्रकाशित होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विरोधी विचारों से जोड़कर देखा और उनका तबादला नरकटियागंज कर दिया। सरकारी जिम्मेदारियों के बीच उनकी साहित्य साधना लगातार जारी रही।
