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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 08, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

पत्नी की क्रूरता के आधार पर तलाक को पटना हाई कोर्ट की मंजूरी, 50000 रुपये मुकदमा खर्च भी देना होगा

Published: Fri, 08 Aug 2025 06:12 PM (IST)

पटना उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के तलाक के फैसले को सही ठहराते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी। ...और पढ़ें

पत्नी की क्रूरता के आधार पर तलाक को पटना हाई कोर्ट की मंजूरी
पत्नी की क्रूरता के आधार पर तलाक को पटना हाई कोर्ट की मंजूरी

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने तलाक के फैसले को सही ठहराया
  2. पत्नी की अपील खारिज, क्रूरता का मामला
  3. 50,000 रुपये मुकदमा खर्च देने का आदेश

विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद में पारिवार न्यायालय, पटना द्वारा दिए गए तलाक के फैसले को सही ठहराते हुए पत्नी की अपील को खारिज कर दिया। यह मामला कुमारी संगीता राय बनाम राजीव रंजन से संबंधित था, जिसमें पारिवार न्यायालय, पटना ने 31 अक्तूबर 2018 को वैवाहिक संबंध को क्रूरता और परित्याग के आधार पर समाप्त कर दिया था।

न्यायाधीश पी. बी. बजनथ्री और न्यायाधीश एस. बी. पी. सिंह एवं की खंडपीठ ने तथ्यों, साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर पारिवार न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया।

क्या था मामला?

राजीव रंजन ने 2009 में अपनी पत्नी संगीता राय के विरुद्ध हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1) के तहत तलाक की अर्जी दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि विवाह के कुछ वर्षों के भीतर ही पत्नी का व्यवहार असहयोगी, हिंसक एवं अमर्यादित हो गया था।

पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का संबंध सह-प्रतिवादी से था, और उसी के चलते वैवाहिक जीवन में दरार उत्पन्न हुई। तथ्यों के अनुसार, पत्नी ने वर्ष 2006 से पति से अलगाव कर लिया था और इसके बाद पति के विरुद्ध विभिन्न आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए, जो अंततः झूठे पाए गए।

2005 में आत्महत्या के प्रयास के दौरान बेटी की मृत्यु हो गई थी और इस संबंध में गवाही उनके बेटे ने भी दी थी कि मां ने खुद पर और बच्चों पर केरोसीन डालकर आग लगाई थी।

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि जीवनसाथी द्वारा निराधार आरोप लगाना, झूठे मुकदमे दर्ज कराना और लंबे समय तक वैवाहिक संबंध से अलग रहना “क्रूरता” और “परित्याग” की श्रेणियों में आता है और इसे बनाए रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक उत्पीड़न का कारण बन सकता है।

हालांकि, पत्नी की स्थायी भरण-पोषण की मांग इस अपील में नहीं स्वीकारी गई, परंतु कोर्ट ने उन्हें ₹50,000 की मुकदमा खर्च देने का आदेश पति को तीन महीने के भीतर देने का निर्देश दिया है।