'आपत्तिजनक स्थिति में देखना कोई सबूत नहीं, व्यभिचार के लिए ठोस प्रमाण चाहिए', पटना हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
पटना हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को आपत्तिजनक अवस्था में देखने भर से व्यभिचार साबित नहीं होता।

पटना हाई कोर्ट।
HighLights
आपत्तिजनक स्थिति और यौन संबंध बनाना दो अलग बातें।
व्यभिचार साबित करने को विश्वसनीय परिस्थितिजन्य साक्ष्य जरूरी।
पटना हाई कोर्ट ने पति की तलाक की अपील खारिज की।
जागरण संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी को कथित तौर पर अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लेने भर से उसके व्यभिचार में लिप्त होने की पुष्टि नहीं होती।
अदालत ने कहा कि 'आपत्तिजनक स्थिति में होना' और 'यौन संबंध बनाना' दो बिल्कुल अलग बातें हैं। व्यभिचार के आरोप को केवल ऐसी किसी एक कथित घटना के आधार पर साबित नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके लिए विश्वसनीय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी आवश्यक है।
न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने गुरुवार को पति की ओर से दायर तलाक की अपील खारिज करते हुए मधुबनी के परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।
पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पत्नी पर व्यभिचार और क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। खंडपीठ ने 1985 के मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि व्यभिचार जैसी घटना का प्रत्यक्षदर्शी मिलना सामान्यतः संभव नहीं होता और ऐसे आरोप परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित किए जाते हैं।
अदालत ने पाया कि पत्नी को कथित तौर पर आपत्तिजनक अवस्था में देखने की घटना के बाद पति ने उसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं की।
स्थानीय पुलिस थाने में सनहा तक दर्ज नहीं कराया गया और न ही अपने वैवाहिक संबंधियों से कोई शिकायत की गई। फैसले में अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि 'आपत्तिजनक स्थिति' और 'यौन संबंध बनाने' में बड़ा अंतर है।
अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि कथित घटना के बाद पति ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। उसके माता-पिता और अन्य रिश्तेदार भी आरोप के समर्थन में सामने नहीं आए। इन परिस्थितियों में महज पत्नी को कथित आपत्तिजनक अवस्था में देखने के आधार पर व्यभिचार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
क्या है मामला?
मामले के अनुसार, दंपती की शादी 2006 में हुई थी और करीब चार वर्ष बाद उन्हें एक पुत्र हुआ। बाद के वर्षों में उनके वैवाहिक संबंधों में विवाद शुरू हो गया।
पति का आरोप था कि वर्ष 2013 में उसने पत्नी को अपने जीजा के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा। इसके बाद उसने मधुबनी परिवार न्यायालय में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत व्यभिचार और क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की।
परिवार न्यायालय ने गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद पति के आरोपों को पर्याप्त साक्ष्य से पुष्ट नहीं पाया और तलाक की अर्जी खारिज कर दी।
इसके खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में अपील की थी। सुनवाई के बाद खंडपीठ ने परिवार न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।
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