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पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: रिटायरमेंट के 4 साल बाद पेंशन में कटौती गैरकानूनी, 6% ब्याज के साथ भुगतान का आदेश

Published: Tue, 13 Oct 2026 07:02 PM (IST)

पटना हाई कोर्ट ने सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन में 75% कटौती के आदेश को रद कर दिया है। अदालत ने ...और पढ़ें

पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, रिटायरमेंट के बाद 75% पेंशन कटौती अवैध, आदेश रद (AI Generated Image)

पटना हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, रिटायरमेंट के बाद 75% पेंशन कटौती अवैध, आदेश रद (AI Generated Image)

HighLights

  1. सेवानिवृत्त अधिकारी की 75% पेंशन कटौती रद्द।

  2. चार साल बाद विभागीय कार्यवाही अवैध मानी गई।

  3. ब्याज सहित पूरी पेंशन भुगतान का आदेश।

विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी की पेंशन में 75 प्रतिशत स्थायी कटौती के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के बाद चार साल से अधिक पुराने मामले में विभागीय कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।

अदालत ने राज्य सरकार को अधिकारी की पूरी पेंशन और रोकी गई अन्य सेवानिवृत्ति संबंधी राशि आठ सप्ताह के भीतर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया है।

न्यायाधीश कुमार मनीष की एकलपीठ ने उमेश कुमार वर्मा की याचिका पर यह फैसला सुनाया। अधिकारी पर अररिया में सांसद एवं विधायक क्षेत्र विकास योजनाओं के तहत हाईमास्ट लाइट लगाने के कार्य में कथित वित्तीय अनियमितता का आरोप था।

संबंधित अवधि 2006 से 2009 के बीच की थी। याचिकाकर्ता 31 दिसंबर 2014 को सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि आरोपपत्र उन्हें 10 जनवरी 2015 को मिला था।

अदालत ने मूल सरकारी अभिलेखों की जांच में पाया कि आरोपपत्र सेवानिवृत्ति से पहले अधिकारी को नहीं दिया गया था। ऐसे में बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत कार्यवाही शुरू होने की तारीख आरोपपत्र की वास्तविक तामील मानी जाएगी।

इस आधार पर चार साल की निर्धारित समय-सीमा का उल्लंघन हुआ। हाई कोर्ट ने विभागीय जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन पर भी सवाल उठाए।

जांच अधिकारी ने जिलाधिकारी की ऐसी रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसकी प्रति अधिकारी को नहीं दी गई और न ही उसका पक्ष रखने का अवसर मिला।

अदालत ने यह भी पाया कि बिना सक्षम प्राधिकारी की औपचारिक मंजूरी के आरोपों की संख्या चार से बढ़ाकर छह कर दी गई थी।

अदालत ने विभागीय कार्यवाही और दंडादेश रद करते हुए मामले को दोबारा जांच के लिए भेजने से भी इनकार कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को देरी और प्रक्रियागत अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया।

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